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11-06-2026

सडक़ क्रांति से क्यों नहीं बढ़ी ट्रक्स की गति

  •  मोदी सरकार के 12 साल पूरे हो गए। सरकार की सबसे बड़ी विजिबल (दिखती हुई) कामयाबी का क्रेडिट रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी को जाता है। देशभर में एक दशक में नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे का जाल सा बिछ गया। गडकरी ने यह दावा कर भी महफिल लूट ली थी कि सिर्फ दो साल में इंडिया की रोड्स अमेरिका से भी बढिय़ा हो जाएंगी। आम धारणा है कि पिछले 12 साल में हजारों किलोमीटर नई सडक़ें बनीं, ट्रेवल टाइम घटा और कई इकोनॉमिक कॉरिडोर को आधुनिक बनाया गया। लेकिन एक लेटेस्ट सरकारी स्टडी में यह बात सामने आई कि इंफ्रास्ट्रक्चर में किए गए भारी-भरकम इंवेस्टमेंट का पूरा फायदा गुड्स ट्रांसपोर्ट यानी ट्रक्स तक नहीं पहुंच पा रहा है। कारण ट्रक सडक़ पर कम चल रहे हैं और वेयरहाउस, फैक्ट्री और लॉजिस्टिक्स हब्स पर ज्यादा समय बर्बाद हो रहा है। भारत में लगभग 70 परसेंट गुड्स ट्रांसपोर्ट सडक़ से होता है। ऐसे में ट्रक्स की एफीशिएंसी ही पूरे सप्लाई चेन की कंपीटिटिवनैस तय करती है। इस स्टडी रिपोर्ट के बाद रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री ने डीपीआईआईटी (Department for Promotion of Industry and Internal Trade) से लोडिंग और अनलोडिंग में होने वाली समय की बर्बादी घटाने के उपाय करने का अनुरोध किया है। रोड फास्ट, ट्रक स्लो : स्टडी के अनुसार 100-120 किमी की डिजाइन स्पीड वाले आधुनिक एक्सप्रेसवे व नेशनल हाईवे बनने के बावजूद कमर्शियल वेहीकल्स की एवरेज स्पीड नहीं बढ़ पा रही है। नेशनल हाईवे पर ट्रक औसत केवल 37-38 किमी की स्पीड से चल पा रहे हैं जबकि एक्सप्रेसवे पर औसत स्पीड 47-48 किमी है। वित्त वर्ष 2014 में औसत स्पीड 35-37 किमीे थी। यानी एक दशक में अरबों डॉलर के इंवेस्टमेंट के बावजूद वास्तविक फायदा सीमित ही रहा है। भारत के उलट अमेरिका और चीन जैसे देशों में कमर्शियल वेहीकल्स की एवरेज स्पीड 65-70 किमी है। सडक़ नहीं, वेयरहाउस : स्टडी के अनुसार ट्रक को लोड और अनलोड करने में पूरा-पूरा दिन लग जाता है जिससे एक्सप्रेसवे पर स्पीड में हुए सुधार का फायदा खत्म हो जाता है। कई  बार टाइमबाउंड डिलीवरी की शर्त नहीं होने के कारण ट्रांसपोर्टर फ्यूल बचाने के लिए ट्रक्स को मीडियम स्पीड पर चलाते हैं। रिपोर्ट के बाद अब खबर है कि सरकार टाइमबाउंड डिलिवरी सिस्टम अब ज्यादा आइटम्स पर लागू करने के प्लान पर काम कर रही है। इससे कमर्शियल वेहीकल्स का टर्नअराउंड टाइम (फेरे में लगने वाला समय) घटेगा, ट्रक यूटिलाइजेशन बढ़ेगा और कुल लॉजिस्टिक्स कॉस्ट घटेगी। चर्चा है कि ड्राइवरों के लिए दूरी पर आधारित पेमेंट के बजाय समय आधारित इंसेंटिव स्कीम पर भी विचार किया जा रहा है। साथ में लगी टेबल के अनुसार एक दशक में नेशनल हाईवे नेटवर्क लगभग 50 परसेंट बढ़ा है, जबकि एक्सप्रेसवे नेटवर्क सात गुना हो चुका है। रियल एस्टेट और लॉजिस्टिक्स कन्सल्टेंट नाइट फ्रेंक के अनुसार, भारत की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट एक दशक पहले जीडीपी के 13-14 परसेंट के बराबर थी जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर जीडीपी के 10-10.5 परसेंट पर आ गई। अमेरिका में लॉजिस्टिक्स कॉस्ट जीडीपी के 9 परसेंट से कम है, जबकि चीन में यह 9-12' के बीच है। प्राइसवॉटरहाउसकूपर्स इंडिया के एनेलिस्ट्स के अनुसार 2030 तक ट्रेन्ड ट्रक ड्राइवरों की कमी ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री के लिए बड़ा चैलेंज होगा।

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सडक़ क्रांति से क्यों नहीं बढ़ी ट्रक्स की गति

 मोदी सरकार के 12 साल पूरे हो गए। सरकार की सबसे बड़ी विजिबल (दिखती हुई) कामयाबी का क्रेडिट रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी को जाता है। देशभर में एक दशक में नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे का जाल सा बिछ गया। गडकरी ने यह दावा कर भी महफिल लूट ली थी कि सिर्फ दो साल में इंडिया की रोड्स अमेरिका से भी बढिय़ा हो जाएंगी। आम धारणा है कि पिछले 12 साल में हजारों किलोमीटर नई सडक़ें बनीं, ट्रेवल टाइम घटा और कई इकोनॉमिक कॉरिडोर को आधुनिक बनाया गया। लेकिन एक लेटेस्ट सरकारी स्टडी में यह बात सामने आई कि इंफ्रास्ट्रक्चर में किए गए भारी-भरकम इंवेस्टमेंट का पूरा फायदा गुड्स ट्रांसपोर्ट यानी ट्रक्स तक नहीं पहुंच पा रहा है। कारण ट्रक सडक़ पर कम चल रहे हैं और वेयरहाउस, फैक्ट्री और लॉजिस्टिक्स हब्स पर ज्यादा समय बर्बाद हो रहा है। भारत में लगभग 70 परसेंट गुड्स ट्रांसपोर्ट सडक़ से होता है। ऐसे में ट्रक्स की एफीशिएंसी ही पूरे सप्लाई चेन की कंपीटिटिवनैस तय करती है। इस स्टडी रिपोर्ट के बाद रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री ने डीपीआईआईटी (Department for Promotion of Industry and Internal Trade) से लोडिंग और अनलोडिंग में होने वाली समय की बर्बादी घटाने के उपाय करने का अनुरोध किया है। रोड फास्ट, ट्रक स्लो : स्टडी के अनुसार 100-120 किमी की डिजाइन स्पीड वाले आधुनिक एक्सप्रेसवे व नेशनल हाईवे बनने के बावजूद कमर्शियल वेहीकल्स की एवरेज स्पीड नहीं बढ़ पा रही है। नेशनल हाईवे पर ट्रक औसत केवल 37-38 किमी की स्पीड से चल पा रहे हैं जबकि एक्सप्रेसवे पर औसत स्पीड 47-48 किमी है। वित्त वर्ष 2014 में औसत स्पीड 35-37 किमीे थी। यानी एक दशक में अरबों डॉलर के इंवेस्टमेंट के बावजूद वास्तविक फायदा सीमित ही रहा है। भारत के उलट अमेरिका और चीन जैसे देशों में कमर्शियल वेहीकल्स की एवरेज स्पीड 65-70 किमी है। सडक़ नहीं, वेयरहाउस : स्टडी के अनुसार ट्रक को लोड और अनलोड करने में पूरा-पूरा दिन लग जाता है जिससे एक्सप्रेसवे पर स्पीड में हुए सुधार का फायदा खत्म हो जाता है। कई  बार टाइमबाउंड डिलीवरी की शर्त नहीं होने के कारण ट्रांसपोर्टर फ्यूल बचाने के लिए ट्रक्स को मीडियम स्पीड पर चलाते हैं। रिपोर्ट के बाद अब खबर है कि सरकार टाइमबाउंड डिलिवरी सिस्टम अब ज्यादा आइटम्स पर लागू करने के प्लान पर काम कर रही है। इससे कमर्शियल वेहीकल्स का टर्नअराउंड टाइम (फेरे में लगने वाला समय) घटेगा, ट्रक यूटिलाइजेशन बढ़ेगा और कुल लॉजिस्टिक्स कॉस्ट घटेगी। चर्चा है कि ड्राइवरों के लिए दूरी पर आधारित पेमेंट के बजाय समय आधारित इंसेंटिव स्कीम पर भी विचार किया जा रहा है। साथ में लगी टेबल के अनुसार एक दशक में नेशनल हाईवे नेटवर्क लगभग 50 परसेंट बढ़ा है, जबकि एक्सप्रेसवे नेटवर्क सात गुना हो चुका है। रियल एस्टेट और लॉजिस्टिक्स कन्सल्टेंट नाइट फ्रेंक के अनुसार, भारत की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट एक दशक पहले जीडीपी के 13-14 परसेंट के बराबर थी जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर जीडीपी के 10-10.5 परसेंट पर आ गई। अमेरिका में लॉजिस्टिक्स कॉस्ट जीडीपी के 9 परसेंट से कम है, जबकि चीन में यह 9-12' के बीच है। प्राइसवॉटरहाउसकूपर्स इंडिया के एनेलिस्ट्स के अनुसार 2030 तक ट्रेन्ड ट्रक ड्राइवरों की कमी ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री के लिए बड़ा चैलेंज होगा।


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