भारत का तेजी से बढ़ता माइक्रो-ड्रामा मार्केट मॉनेटाइजेशन के एक नए दौर में पहुंच रहा है। इसमें विज्ञापन सब्सक्रिप्शन और एपिसोड के लिए पेमेंट के साथ रेवेन्यू का एक अहम जरिया बनकर उभर सकता है। रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स रिपोर्ट के मुताबिक, माइक्रो-ड्रामा मार्केट फाइनेंशियल ईयर 2032 तक करीब 23,500-25,500 करोड़ रुपये का हो सकता है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में करीब 2,300 करोड़ रुपये से शुरू होकर यह छह साल में 10 गुना से ज्यादा बढ़ सकता है। रेडसीर के मुताबिक फाइनेंशियल ईयर 2027 में मार्केट 4,600 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। हालांकि, बड़ा बदलाव रेवेन्यू मिक्स में देखने को मिलेगा। अभी सब्सक्रिप्शन से माइक्रो-ड्रामा का करीब 99 प्रतिशत रेवेन्यू आता है, लेकिन वित्तीय वर्ष 2027 में विज्ञापन की हिस्सेदारी बढक़र करीब 95 प्रतिशत हो सकती है। विज्ञापन से मिलने वाला रेवेन्यू फाइनेंशियल ईयर 2026 के 24 करोड़ रुपये से बढक़र वित्तीय वर्ष 2027 में 210 करोड़ रुपये और 2032 तक 5,500 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। विज्ञापन से चलने वाले वीडियो-ऑन-डिमांड (एवीओडी) को अपनाने से कैटेगरी का यूजर बेस भी काफी बढ़ सकता है। रेडसीर का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2032 तक एवीओडी के डेली एक्टिव यूजर्स 140-150 मिलियन तक पहुंच सकते हैं, जो मौजूदा बेस से करीब आठ गुना ज्यादा होगा। फिलहाल माइक्रो-ड्रामा की ऑडियंस मुख्य रूप से पेइंग यूजर्स में है। 2026 में करीब 15-17 मिलियन कंज्यूमर्स हर महीने माइक्रो-ड्रामा पर पेमेंट कर रहे हैं, जबकि करीब 40 मिलियन यूजर्स हर महीने कम से कम एक सीरीज देख रहे हैं। रेडसीर के मुताबिक, भारत में पेड डिजिटल कंटेंट के लिए करीब 250-280 मिलियन एडल्ट यूजर्स का बड़ा बेस मौजूद है। ऐसे में एड-सपोर्टेड एक्सेस के जरिए प्लेटफॉर्म इस बड़े संभावित ऑडियंस तक पहुंच सकते हैं।
माइक्रो-ड्रामा के लिए कंज्यूमर की डिमांड भी मजबूत दिख रही है। सर्वे में शामिल 65 प्रतिशत कंज्यूमर्स ने कहा कि वे एड-सपोर्टेड माइक्रो-ड्रामा एक्सपीरियंस में दिलचस्पी रखते हैं। रेडसीर के मुताबिक, कंज्यूमर्स पहले ही साबित कर चुके हैं कि वे माइक्रो-ड्रामा के लिए पेमेंट करने को तैयार हैं। अब बड़ा मौका उस ज्यादा बड़े ऑडियंस बेस को मोनेटाइज करने का है जो सब्सक्राइबर बेस से बाहर है। रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स के एसोसिएट पार्टनर ने कहा कि माइक्रो-ड्रामा एडवर्टाइजर्स के लिए खास तौर पर आकर्षक हैं, क्योंकि ये छोटे होते हैं, इन्हें बार-बार देखा जाता है और अक्सर बिना प्लानिंग के भी देख लिया जाता है। सीरियलाइज्ड स्टोरीटेलिंग और क्लिफहैंगर्स बार-बार विजिट बढ़ा सकते हैं और प्लेटफॉर्म को एडवर्टाइजमेंट दिखाने के ज्यादा मौके दे सकते हैं। प्लेटफॉर्म रिवॉर्डेड एड्स और एडवर्टाइजिंग-लिंक्ड कंटेंट अनलॉक जैसे फॉर्मेट अपना सकते हैं, साथ ही यूजर्स को बिना रुकावट देखने के लिए एड-फ्री सब्सक्रिप्शन का ऑप्शन भी दिया जा सकता है। हालांकि, एडवरटाइजिंग से चलने वाले मॉडल को बड़े स्तर पर बढ़ाने के लिए प्लेटफॉर्म्स को ज्यादा कंटेंट लाइब्रेरी और तेज रिलीज साइकल की जरूरत होगी। शॉर्ट प्रोडक्शन फॉर्मेट को माइक्रो-ड्रामा की कैपेसिटी के साथ जोडऩे से अलग-अलग भाषाओं में स्केल करना आसान हो सकता है। इससे कैटेगरी को शुरुआती यूजर्स से आगे भी बढ़ाने में मदद मिल सकती है। जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी प्रोडक्शन को और बेहतर कर सकता है। यह स्क्रिप्टिंग, लोकलाइजेशन, पोस्ट-प्रोडक्शन, रिकमेंडेशन और मार्केटिंग में मदद कर सकता है। कम प्रोडक्शन कॉस्ट से प्लेटफॉर्म कंटेंट की फ्रीक्वेंसी बढ़ा सकते हैं और एड-सपोर्ट वाले बिजनेस के लिए जरूरी एडवर्टाइजिंग इन्वेंट्री तैयार कर सकते हैं। हालांकि, इस ट्रांजिशन के लिए मीडिया, एडवर्टाइजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, मेजरमेंट और प्रोग्रामेटिक कैपेबिलिटीज में ज्यादा निवेश की जरूरत होगी।
