भारत को डिजिटल दुनिया का गढ़ कहा जा रहा है। ऑनलाइन शॉपिंग, डिजिटल पेमेंट और एप बेस्ड सर्विसेस का विस्तार तेजी से हुआ है। आपको भरोसा नहीं होगा कि वर्ष 2014 में देश की डिजिटल इकोनॉमी का साइज केवल 107 बिलियन डॉलर (जीडीपी का 5.4 परसेंट) था जो वर्ष 2025 में करीब 550 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई और इसका जीडीपी में योगदान 15 परसेंट के करीब हो गया। देश में 70 करोड़ लोग ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, फूड डिलीवरी एप, ट्रैवल बुकिंग और डिजिटल सब्सक्रिप्शन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस डिजिटल क्रांति के साथ डार्क पैटर्न बड़ा चैलेंज बनकर सामने आया है। डार्क पैटर्न ऐसी डिजाइन स्ट्रेटेजी हैं जिनके जरिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कंज्यूमर के व्यवहार पर असर डालते हैं और उन्हें ऐसे फैसले लेने के लिए ललचाते हैं जो वे सामान्य रूप से नहीं लेते। एक अनुमान के अनुसार, डार्क पैटर्न के कारण भारतीय ऑनलाइन बायर को हर साल लगभग 28 हजार करोड़ रुपये तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है। यह नुकसान सीधे एक्सट्रा पेमेंट (महंगी प्राइस में खरीदना), अनचाही सर्विसेस के लिए पेमेंट करना, हिडन चार्जेज यानी छिपे हुए शुल्क और शॉपिंग को गलत तरीके से प्रभावित करने के कारण होता है। डार्क पैटर्न अक्सर इतने सामान्य तरीके से इस्तेमाल किए जाते हैं कि ग्राहक को तुरंत पता नहीं चलता कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है। उदाहरण के लिए, किसी वेबसाइट पर सिर्फ 2 सामान बाकी हैं या ऑफर कुछ मिनट में खत्म होगा जैसी मैसेजिंग बायर पर हड़बड़ी में जल्दी फैसला करने के लिए दबाव बनाते हैं। आमतौर पर ऐसा होता नहीं है लेकिन बायर के दिमाग से खेलने के लिए किया जाता है ताकि सेल्स बढ़े। एक अन्य आम तरीका छिपे हुए शुल्क (ड्रिप प्राइसिंग) का है। इसमें ग्राहक को शुरुआत में कम कीमत दिखाई जाती है, लेकिन भुगतान के अंतिम चरण में डिलीवरी चार्ज, सर्विस चार्ज या अन्य चार्ज जोड़ दिए जाते हैं। इसी तरह कई एप में फ्री ट्रायल खत्म होने के बाद ऑटोमैटिक सब्सक्रिप्शन शुरू हो जाता है और ग्राहक को इसकी जानकारी देर से मिलती है। कुछ प्लेटफॉर्म ऐसे डिजाइन का इस्तेमाल करते हैं जहां ग्राहक के लिए किसी सेवा को शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे बंद करना बहुत मुश्किल होता है। इसे रोडब्लॉक या कन्फर्म शेमिंग जैसे डार्क पैटर्न में गिना जाता है, जिसमें बायर को किसी विकल्प को चुनने पर असहज महसूस कराया जाता है। भारत सरकार ने डिजिटल कंज्यूमर की सुरक्षा के लिए डार्क पैटर्न पर गाइडलाइन्स जारी की हैं। इन नियमों के तहत फर्जी छूट, जबरदस्ती खरीद, गलत विज्ञापन, छिपे शुल्क और अनचाही सदस्यता जैसी तकनीकों को अनुचित व्यापार व्यवहार माना गया है। बढ़ते नियामकीय दबाव के बाद कई डिजिटल कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म की समीक्षा शुरू की है। सरकार चाहती है कि ऑनलाइन कंपनियां ऐसे डिजाइन अपनाएं जो ग्राहकों को भ्रमित करने के बजाय स्पष्ट जानकारी देकर निर्णय लेने में मदद करें। भारत जैसे तेजी से बढ़ते डिजिटल बाजार में कंज्यूमर ट्रस्ट सबसे महत्वपूर्ण असैट बनता जा रहा है। लंबे समय में वही कंपनियां सफल होंगी जो केवल सेल्स बढ़ाने के लिए मनोवैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल नहीं करेंगी, बल्कि पारदर्शिता, बेहतर सेवा और ग्राहक अनुभव के आधार पर प्रतिस्पर्धा करेंगी।