कार्पेट बॉम्बिंग यानी भारी बमबारी। अभी तीन सप्ताह ही हुए है अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप की चायना विजिट को। शी जिनपिंग और ट्रंप की तस्वीरों से साफ दिख रहा था कि मामला गड़बड़ है हालांकि ट्रंप ने कहा था कि उनका यह दौरा कामयाब रहा है। लेकिन अब जिस तरह से अमेरिका ने चीन पर अटैक किया है उससे वर्तमान और फ्यूचर सुपरपावर के बीच बिगाडख़ाते (संबंध खराब होना) का अंदेशा बढ़ रहा है। अमेरिका ने चीन पर तगड़ा अटैक करते हुए चीन की टेक दिग्गज कंपनियों ई-कॉमर्स लीडर अलीबाबा, इंटरनेट सर्च कंपनी बायदू, ईवी कंपनियों बीवाईडी और निओ को उन कंपनियों की लिस्ट में डाल दिया है जिनके बारे में अमेरिका का मानना है कि वे बीजिंग की सेना की मदद कर रही हैं। इस कदम से दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है। अपनी इस चायना विजिट के दौरान प्रेसिडेंट ट्रंप अमेरिका के टॉप 23 बिजनस लीडर और आंत्रप्रेन्यॉर को साथ लेकर गए थे। अमेरिका ने 2025 की शुरुआत में यह लिस्ट बनाई थी और अब लंबे समय बाद इसे अपडेट किया गया है।चीन के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका के इस एक्शन पर कहा कि चीनी कंपनियों को अनुचित तरीके से दबाया है।अमेरिका का यह एक्शन इसलिए बहुत बड़ा है क्योंकि ग्लोबल मार्केट में चीन की जो भी पोजिशनिंग है उसमें इन टेक दिग्गज कंपनियों का बड़ा योगदान है। यही कंपनियां चीन की मिलिटरी पावर और इंडस्ट्रियल कैपेसिटी को शोकेस करने के लिए बहुत अहम मानी जाती हैं। माना जा रहा है कि चीन और अमेरिका के बीच जियो-पॉलिटिकल एक नए लेवल पर पहुंच रहा है। इस लिस्ट में चीन की मेमोरी चिपमेकर सीएक्सएमटी और वाईएमटीसी भी शामिल हैं। साथ ही बायोटेक कंपनी वूशी ऐपटेक, एआई-रोबोटिक्स कंपनी रोबोसेंस टेक्नोलॉजी और ह्यूमेनॉइड रोबोट बनाने वाली कंपनी यूनिट्री भी शामिल हैं। दुनिया की सबसे बड़ी ईवी मेकर बीवाईडी ने कहा कि वह खुद को मिलिटरी कंपनी बताए जाने का कड़ा विरोध करती है। अलीबाबा ने कहा वह न तो चीनी मिलिटरी कंपनी है और न ही किसी मिलिटरी-सिविल जॉइंट स्ट्रेटेजी में शामिल है। सर्च इंजन और एआई कंपनी बायदू ने कहा कि उसे मिलिटरी कंपनी बताने का कोई आधार नहीं है। पेंटागन के अनुसार सूची में शामिल कंपनियां अमेरिकी कानून के तहत चीनी मिलिटरी कंपनियों की कैटेगरी में आती हैं। कंपनियां इस सूची से अपना नाम हटाने के लिए आवेदन कर सकती हैं। मेरिकी सेना इन कंपनियों से खरीद नहीं कर सकेगी। इस सूची में शामिल होना सीधे तौर पर बैन नहीं है, लेकिन नए अमेरिकी कानून के तहत अमेरिकी रक्षा विभाग इस सूची में शामिल कंपनियों के साथ सीधे कोई डील नहीं कर पाएगा। एनेलिस्ट्स के अनुसार इस एक्शन से पता चलता है कि अमेरिका इन्हें केवल कंपनियां नहीं बल्कि चीन के पूरे टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम से जुड़ा हुआ मानता है। वॉशिंगटन के फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के चीन एक्सपर्ट ग्रेग सिंगलटन के अनुसार अमेरिका अब चीनी टेक्नोलॉजी को केवल ट्रेड नहीं बल्कि नेशनल सिक्यॉरिटी का मुद्दा मान रहा है।