ग्लोबल लिकर इंडस्ट्री सालों से इस भरोसे में थी कि हाई ग्रोथ ना सही लेकिन स्टेबल डिमांड बनी रहेगी। सोशियलाइजिंग, पार्टी, और कंज्यूमर कल्चर से बीयर, वाइन और स्पिरिट कंपनियों को लगातार ग्रोथ के दशकों दिए। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। हेल्थ को लेकर जागरूकता, बढ़ती लाइफस्टाइल कॉस्ट और बदलते कंज्यूमर बिहेवियर के कारण लोग कम शराब पी रहे हैं। नतीजा दुनिया की दिग्गज लिकर कंपनियों के मार्केट कैप से सैकड़ों बिलियन) डॉलर मिट चुके हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार वर्ष 2021 के बाद से ग्लोबल लिकर इंडस्ट्री के मार्केट वेल्यूएशन में लगभग 830 बिलियन डॉलर घट चुके हैं। वेटलॉस (जीएलपी-1) दवाओं की बढ़ रही डिमांड और कैनेबिस (भांग, गांजा)का चलन बढऩे से भी ग्लोबल लिकर इंडस्ट्री पर प्रेशर बढ़ रहा है। मार्केट रिसर्च फर्म आईडबल्यूएसआर के डेटा के अनुसार, 2019 से 2025 के बीच ग्लोबल लिकर कंजम्पशन औसत 2 परसेंट सालाना गिरा। चिंता यह है कि गिरावट लगभग सभी कैटेगरी बीयर, वाइन, स्पिरिट, हार्ड साइडर और रेडी-टू-ड्रिंक कॉकटेल में देखी गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन चेतावनी दे रहा है कि शराब की कितनी भी कम मात्रा पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। स्वास्थ्य पर पडऩे वाले प्रभावों को लेकर बढ़ती जागरूकता ने खासकर युवा पीढ़ी के व्यवहार को बदला है। अमेरिका और यूरोप में युवा अब माइंडफुल ड्रिंकिंग या सोबर क्यूरियस लाइफस्टाइल को अपना रहे हैं, जिसमें शराब का सेवन सीमित या पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। दूसरी ओर बढ़ती महंगाई और घरेलू बजट पर दबाव के कारण लोग बार, रेस्तरां और शराब पर खर्च कम कर रहे हैं। इसके अलावा, नॉन-अल्कोहोलिक ड्रिंक्स, कैनेबिस और वेटलॉस दवाओं जैसे नए विकल्प भी दबाव बढ़ा रहे हैं। नतीजा कई बड़ी कंपनियां कमजोर मांग, लागत दबाव और बिक्री में गिरावट का सामना कर रही हैं। कई शराब कंपनियों के शेयरों की पिछले कुछ वर्ष में भारी धुनाई हो चुकी है। केवल 2021 के बाद से ग्लोबल लिकर इंडस्ट्री के मार्केट कैप में लगभग 830 बिलियन डॉलर की सफाई हो चुकी है। एनेलिस्ट्स के अनुसार यह केवल फौरी स्लोडाउन नहीं बल्कि कंज्यूमर बिहेवियर में स्ट्रक्चरल बदलाव हो सकता है। इसे देखते हुए दुनिया की कई बड़ी कंपनियां अब नॉन-अल्कोहोलिक बीयर, लो-अल्कोहोल बेवरेज और हेल्द प्रोडक्ट्स पर अधिक जोर दे रही हैं।
