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18-06-2026

इंडिया ने स्टारलिंक को किया डीलिंक?

  •  अभी पिछले सप्ताह ही आपने सुना होगा कि इंडिया ने एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस स्टारलिंक का सिक्यॉरिटी क्लीयरेंस (सुरक्षा मंजूरी) रोक दिया। अब खबर आ रही है कि स्टारलिंक को इंटर-सैटेलाइट लेजर लिंक (आईएसएलएल / एलआईएसएल) तकनीक का इस्तेमाल करने की अनुमति भारत सरकार से मिलने की संभावना बहुत कम है। इस टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारलिंक स्पेस में एक सैटेलाइट्स से दूसरे सैटेलाइट्स को डायरेक्ट डेटा भेज सकते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार को चिंता है कि स्टारलिंक की यह टेक्नोलॉजी मॉनिटरिंग और नेशनल सिक्यॉरिटी के लिए बड़ा रिस्क पैदा कर सकती है। इंटर-सैटेलाइट लेजर लिंक के जरिए स्टारलिंक के नए सैटेलाइट पृथ्वी के ऊपर एक मेश (जालीनुमा) नेटवर्क बना सकते हैं जिससे नेटवर्क की मॉनिटरिंग बहुत बड़ा चैलेंज बन सकती है। एनेलिस्ट्स के अनुसार स्टारलिंक सैटेलाइट्स पृथ्वी के ऊपर एक मेश (जालीनुमा) नेटवर्क बनाने के कारण आशंका है कि भारतीय यूजर का डेटा अपने अंतिम मुकाम तक पहुंचने से पहले किसी ऐसे देश या निगरानी केंद्र से होकर गुजर जाए, जिस पर भारत भरोसा नहीं करता। मामले से जुड़े एक्सपर्ट्स के अनुसार यह मुद्दा स्टारलिंक के सामने उठाया गया है और ऐसा होने से रोकने के लिए सुरक्षा उपायों पर काम किया जा रहा है। बिना लेजर लिंक की सुविधा वाले पुराने सैटेलाइट के मामले में भारतीय यूजर्स से जुड़े ट्रैफिक के लिए डेटा लिंक को बंद या लिमिट किया जा सकता है। एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के स्वामित्व वाली स्टारलिंक भारतीय अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत कर रही है। स्टेकहोल्डर बैठकों के दौरान लेजर लिंक तकनीक और इससे जुड़े संभावित निगरानी एवं सुरक्षा जोखिमों पर चर्चा हुई है। हालांकि, स्टारलिंक ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है।

    स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रेयर ने कहा कि कंपनी ने भारत सरकार के साथ सभी जरूरी रेगुलेटरी और कंप्लायंस पर काम किया है। उन्होंने उन रिपोट्र्स का खंडन किया कि ईरान में प्रदर्शनों के दौरान स्टारलिंक ने ईरान के आमजन के लिए सैटेलाइट टर्मिनल खोले जबकि उन दिनों देश में आधिकारिक रूप से इंटरनेट पर बैन था। रिपोर्ट्स के अनुसार भारत सरकार ने स्टारलिंक के साथ बातचीत ईरान में उसकी भूमिका को लेकर गहराई से पूछताछ की है और फिर इसका सिक्यॉरिटी क्लीयरेंस रोक दिया गया है। स्टारलिंक को भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाएं देने के लिए लाइसेंस मिल चुका है लेकिन सिक्यॉरिटी क्लीयरेंस का इंतजार है। कंपनी ने नियामकीय और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत में ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार कर लिया है। अब कंपनी सर्विस शुरू करने से पहले अंतिम मंजूरी, जिसमें स्पेक्ट्रम आवंटन भी शामिल है, का इंतजार कर रही है। स्टारलिंक के साथ दो कंपनियां भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब और जियो-एसईएस स्पेस टेक्नोलॉजी स्पेक्ट्रम आवंटन का इंतजार कर रही हैं। ये कंपनियां भी भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू करने की तैयारी में हैं। लॉरेन ड्रेयर ने कहा कि स्टारलिंक ने भारत के लिए एक विशेष नेटवर्क मॉडल तैयार किया है, जो देश की सोवरीन तकनीकी जरूरतों, रेगुलेटरी और सिक्यॉरिटी आवश्यकताओं के अनुरूप होगा। हालांकि सरकार की मुख्य चिंता यह है कि स्पेस में मौजूद सैटेलाइट नेटवर्क के जरिए डेटा का फ्लो भारत की सुरक्षा व्यवस्था के कंट्रोल से बाहर न चला जाए।

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इंडिया ने स्टारलिंक को किया डीलिंक?

 अभी पिछले सप्ताह ही आपने सुना होगा कि इंडिया ने एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस स्टारलिंक का सिक्यॉरिटी क्लीयरेंस (सुरक्षा मंजूरी) रोक दिया। अब खबर आ रही है कि स्टारलिंक को इंटर-सैटेलाइट लेजर लिंक (आईएसएलएल / एलआईएसएल) तकनीक का इस्तेमाल करने की अनुमति भारत सरकार से मिलने की संभावना बहुत कम है। इस टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारलिंक स्पेस में एक सैटेलाइट्स से दूसरे सैटेलाइट्स को डायरेक्ट डेटा भेज सकते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार को चिंता है कि स्टारलिंक की यह टेक्नोलॉजी मॉनिटरिंग और नेशनल सिक्यॉरिटी के लिए बड़ा रिस्क पैदा कर सकती है। इंटर-सैटेलाइट लेजर लिंक के जरिए स्टारलिंक के नए सैटेलाइट पृथ्वी के ऊपर एक मेश (जालीनुमा) नेटवर्क बना सकते हैं जिससे नेटवर्क की मॉनिटरिंग बहुत बड़ा चैलेंज बन सकती है। एनेलिस्ट्स के अनुसार स्टारलिंक सैटेलाइट्स पृथ्वी के ऊपर एक मेश (जालीनुमा) नेटवर्क बनाने के कारण आशंका है कि भारतीय यूजर का डेटा अपने अंतिम मुकाम तक पहुंचने से पहले किसी ऐसे देश या निगरानी केंद्र से होकर गुजर जाए, जिस पर भारत भरोसा नहीं करता। मामले से जुड़े एक्सपर्ट्स के अनुसार यह मुद्दा स्टारलिंक के सामने उठाया गया है और ऐसा होने से रोकने के लिए सुरक्षा उपायों पर काम किया जा रहा है। बिना लेजर लिंक की सुविधा वाले पुराने सैटेलाइट के मामले में भारतीय यूजर्स से जुड़े ट्रैफिक के लिए डेटा लिंक को बंद या लिमिट किया जा सकता है। एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के स्वामित्व वाली स्टारलिंक भारतीय अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत कर रही है। स्टेकहोल्डर बैठकों के दौरान लेजर लिंक तकनीक और इससे जुड़े संभावित निगरानी एवं सुरक्षा जोखिमों पर चर्चा हुई है। हालांकि, स्टारलिंक ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है।

स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रेयर ने कहा कि कंपनी ने भारत सरकार के साथ सभी जरूरी रेगुलेटरी और कंप्लायंस पर काम किया है। उन्होंने उन रिपोट्र्स का खंडन किया कि ईरान में प्रदर्शनों के दौरान स्टारलिंक ने ईरान के आमजन के लिए सैटेलाइट टर्मिनल खोले जबकि उन दिनों देश में आधिकारिक रूप से इंटरनेट पर बैन था। रिपोर्ट्स के अनुसार भारत सरकार ने स्टारलिंक के साथ बातचीत ईरान में उसकी भूमिका को लेकर गहराई से पूछताछ की है और फिर इसका सिक्यॉरिटी क्लीयरेंस रोक दिया गया है। स्टारलिंक को भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाएं देने के लिए लाइसेंस मिल चुका है लेकिन सिक्यॉरिटी क्लीयरेंस का इंतजार है। कंपनी ने नियामकीय और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत में ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार कर लिया है। अब कंपनी सर्विस शुरू करने से पहले अंतिम मंजूरी, जिसमें स्पेक्ट्रम आवंटन भी शामिल है, का इंतजार कर रही है। स्टारलिंक के साथ दो कंपनियां भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब और जियो-एसईएस स्पेस टेक्नोलॉजी स्पेक्ट्रम आवंटन का इंतजार कर रही हैं। ये कंपनियां भी भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू करने की तैयारी में हैं। लॉरेन ड्रेयर ने कहा कि स्टारलिंक ने भारत के लिए एक विशेष नेटवर्क मॉडल तैयार किया है, जो देश की सोवरीन तकनीकी जरूरतों, रेगुलेटरी और सिक्यॉरिटी आवश्यकताओं के अनुरूप होगा। हालांकि सरकार की मुख्य चिंता यह है कि स्पेस में मौजूद सैटेलाइट नेटवर्क के जरिए डेटा का फ्लो भारत की सुरक्षा व्यवस्था के कंट्रोल से बाहर न चला जाए।


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