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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

09-05-2026

रिलायंस का स्टारलिंक का रास्ता रोकने का प्लान

  •  रिलायंस इंडस्ट्रीज अब स्पेस-बेस्ड ब्रॉडबैंड के क्षेत्र में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी लो अर्थ ऑर्बिट (लिओ) सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन लॉन्च करने के प्लान पर काम कर रही है जिसके जरिए कंज्यूमर और एंटरप्राइज ग्राहकों को हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराया जा सकेगा। इस लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट कॉन्टेलेशन (सैंकड़ों सैटेलाइट्स का झुंड) प्लान के जरिए रिलायंस इंडस्ट्रीज सैटेलाइट इंटरनेट सेगमेंट के ग्लोबल दिग्गज टेस्ला की स्टारलिंक के सीधे मुकाबले में आ जाएगी। एलन मस्क की स्टारलिंक पहले से ही 100 से अधिक देशों में सर्विस दे रही है। आप यह भी जानते हैं कि वॉर के दौरान यूक्रेन को जरूरी इंटरनेट सर्विस स्टारलिंक ही दे रहा है। इसी तरह ईरान सरकार के इंटरनेट ब्लॉकेड को देखते हुए प्रेसिडेंट ट्रंप ने स्टारलिंक को ही प्रदर्शनकारियों को बेसिक इंटरनेट एक्सैस देने का काम सौेंपा था। हालांकि स्टारलिंक के इस प्लान को चीन और रूस के जैमर ने मिलकर फेल कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट के जरिए सैटेलाइट इंटरनेट के इस प्रोजेक्ट पर रिलायंस अरबों डॉलर का इंवेस्टमेंट करना चाहती है। इस प्रोजेक्ट के लिए कंपनी ने शुरुआती स्तर पर कई इंटरनल टीमें बना दी हैं जो सैटेलाइट डिजाइन, लॉन्च कैपेसिटी, पेलोड और यूजर टर्मिनल जैसे जरूरी पहलुओं पर काम कर रही हैं। इस प्रोजेक्ट की कमान खुद चेयरमैन मुकेश अंबानी के हाथ में है जबकि मैथ्यू ओमन सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें शामिल हैं। यह प्रोजेक्ट सिर्फ व्यावसायिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक घरेलू लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट नेटवर्क भारत को कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकता है और किसी भी संघर्ष या आपात स्थिति में विदेशी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इस प्रोजेक्ट के लिए कंपनी को इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन से ऑर्बिटल स्लॉट और स्पेक्ट्रम हासिल करना होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कंपनी ऐसी सैटेलाइट कंपनी के अधिग्रहण पर भी विचार कर रही है, जिसके पास पहले से ऑर्बिटल स्लॉट और इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हो। इससे प्रोजेक्ट को फास्ट्रेक करने में मदद मिल सकती है। यूटेलसैट वनवेब और अमेजन प्रोजेक्ट कुइपर जैसे खिलाड़ी भी भारत के सैटेलाइट ब्रॉडबैंड मार्केट में मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। रिलायंस भी एसईएस एसए के साथ मिलकर जियो स्पेस टेक्नोलॉजी लि. नाम का जॉइंट वेंचर चला रही है, जो मुख्य रूप से एंटरप्राइज ग्राहकों को सर्विस देता है। हालांकि नए लिओ प्रोजेक्ट के जरिए कंपनी आम कंज्यूमर को बड़े पैमाने पर ब्रॉडबैंड सर्विस देना चाहती है। माना जा रहा है कंपनी इस प्रोजेक्ट को जियो प्लेटफॉम्र्स के तहत संचालित करेगी।

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रिलायंस का स्टारलिंक का रास्ता रोकने का प्लान

 रिलायंस इंडस्ट्रीज अब स्पेस-बेस्ड ब्रॉडबैंड के क्षेत्र में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी लो अर्थ ऑर्बिट (लिओ) सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन लॉन्च करने के प्लान पर काम कर रही है जिसके जरिए कंज्यूमर और एंटरप्राइज ग्राहकों को हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराया जा सकेगा। इस लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट कॉन्टेलेशन (सैंकड़ों सैटेलाइट्स का झुंड) प्लान के जरिए रिलायंस इंडस्ट्रीज सैटेलाइट इंटरनेट सेगमेंट के ग्लोबल दिग्गज टेस्ला की स्टारलिंक के सीधे मुकाबले में आ जाएगी। एलन मस्क की स्टारलिंक पहले से ही 100 से अधिक देशों में सर्विस दे रही है। आप यह भी जानते हैं कि वॉर के दौरान यूक्रेन को जरूरी इंटरनेट सर्विस स्टारलिंक ही दे रहा है। इसी तरह ईरान सरकार के इंटरनेट ब्लॉकेड को देखते हुए प्रेसिडेंट ट्रंप ने स्टारलिंक को ही प्रदर्शनकारियों को बेसिक इंटरनेट एक्सैस देने का काम सौेंपा था। हालांकि स्टारलिंक के इस प्लान को चीन और रूस के जैमर ने मिलकर फेल कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट के जरिए सैटेलाइट इंटरनेट के इस प्रोजेक्ट पर रिलायंस अरबों डॉलर का इंवेस्टमेंट करना चाहती है। इस प्रोजेक्ट के लिए कंपनी ने शुरुआती स्तर पर कई इंटरनल टीमें बना दी हैं जो सैटेलाइट डिजाइन, लॉन्च कैपेसिटी, पेलोड और यूजर टर्मिनल जैसे जरूरी पहलुओं पर काम कर रही हैं। इस प्रोजेक्ट की कमान खुद चेयरमैन मुकेश अंबानी के हाथ में है जबकि मैथ्यू ओमन सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें शामिल हैं। यह प्रोजेक्ट सिर्फ व्यावसायिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक घरेलू लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट नेटवर्क भारत को कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकता है और किसी भी संघर्ष या आपात स्थिति में विदेशी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इस प्रोजेक्ट के लिए कंपनी को इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन से ऑर्बिटल स्लॉट और स्पेक्ट्रम हासिल करना होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कंपनी ऐसी सैटेलाइट कंपनी के अधिग्रहण पर भी विचार कर रही है, जिसके पास पहले से ऑर्बिटल स्लॉट और इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हो। इससे प्रोजेक्ट को फास्ट्रेक करने में मदद मिल सकती है। यूटेलसैट वनवेब और अमेजन प्रोजेक्ट कुइपर जैसे खिलाड़ी भी भारत के सैटेलाइट ब्रॉडबैंड मार्केट में मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। रिलायंस भी एसईएस एसए के साथ मिलकर जियो स्पेस टेक्नोलॉजी लि. नाम का जॉइंट वेंचर चला रही है, जो मुख्य रूप से एंटरप्राइज ग्राहकों को सर्विस देता है। हालांकि नए लिओ प्रोजेक्ट के जरिए कंपनी आम कंज्यूमर को बड़े पैमाने पर ब्रॉडबैंड सर्विस देना चाहती है। माना जा रहा है कंपनी इस प्रोजेक्ट को जियो प्लेटफॉम्र्स के तहत संचालित करेगी।


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