मूंगफली और सरसों के बेहतर गुणवत्ता वाले एडिबल ऑयल के लिए राजस्थान में अलग पहचान रखने वाले निवाई की एडिबल ऑयल इंडस्ट्री इन दिनों दबाव में है। स्थानीय ऑयल मिल संचालकों के अनुसार रॉ-मटेरियल की उपलब्धता घटने और कारोबार की कॉस्ट बढऩे से ऑयल मिलों का प्रोडक्शन अपनी स्थापित कैपेसिटी के मुकाबले करीब 50 फीसदी तक रह गया है। इसका असर मिलों के कारोबार के साथ-साथ स्थानीय मंडी, ट्रांसपोर्टेशन, श्रमिकों और इससे जुड़े दूसरे कारोबारों पर भी पड़ रहा है। वैसे देखा जाए तो राजस्थान की ऑयल मिल इंडस्ट्री व्यापक स्तर पर भी इसी चुनौती से गुजर रही है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार राज्य में पहले करीब 1500 से अधिक ऑयल मिलें थी। इनमें से लगभग 1,000 मिलें बंद हो चुकी हैं, जबकि करीब 600 मिलें ही संचालन में हैं। चालू मिलें भी अपनी पूरी कैपेसिटी पर प्रोडक्शन नहीं कर पा रही हैं और औसतन करीब 50 फीसदी कैपेसिटी पर काम कर रही हैं। निवाई की पहचान क्वालिटी ऑयल से : निवाई का नाम लंबे समय से सरसों और मूंगफली के एडिबल ऑयल की प्रोसेसिंग से जुड़ा रहा है। क्षेत्र में तैयार होने वाले ऑयल की क्वालिटी के कारण स्थानीय उत्पाद को प्रदेश के कई मार्केट्स में पहचान मिली। सरकारी रिकॉर्ड में निवाई सहित प्रदेश के कई क्षेत्रों में सरसों, मूंगफली, बिनौला और तिल से ऑयल निकालने की इंडस्ट्रीयल एक्टीविटी का उल्लेख मिलता है। यही वजह है कि निवाई में ऑयल इंडस्ट्री की समस्या केवल कुछ मिल संचालकों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर एग्री कमोडिटी की खरीद, स्थानीय व्यापार और रोजगार पर पड़ता है।
रॉ-मटेरियल सबसे बड़ी चुनौती : कैलाश उद्योग के विष्णु बोहरा के अनुसार तेल निकालने के लिए नियमित और प्रतिस्पर्धी दर पर सरसों व मूंगफली उपलब्ध होना जरूरी है। जब स्थानीय स्तर पर पर्याप्त आवक नहीं होती तो मिलों को दूसरे क्षेत्रों से रॉ-मटेरियल मंगाना पड़ता है। इससे ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ती है और फिनिश्ड ऑयल की लागत पर दबाव आता है। राजस्थान देश का प्रमुख सरसों उत्पादक राज्य है। वर्ष 2024-25 में राज्य का सरसों उत्पादन करीब 52.03 लाख मीट्रिक टन से अधिक बताया गया है, जो देश के कुल उत्पादन का लगभग 45-49 फीसदी है। राज्य में स्थानीय स्तर पर पर्याप्त प्रोसेसिंग कैपेसिटी का इस्तेमाल नहीं हो पाना इंडस्ट्री के लिए बड़ी चुनौती है। आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में उत्पादित सरसों का करीब 80 फीसदी हिस्सा राज्य से बाहर जाता है, जबकि स्थानीय स्तर पर करीब 20 फीसदी की खपत होती है।
मिलें आधी कैपेसिटी पर, लागत का दबाव बढ़ा : स्वास्तिक उद्योग के प्रमुख सुशील कटारिया के मुताबिक निवाई की मिलों के लिए दूसरी बड़ी चुनौती बढ़ती ऑपरेटिंग कॉस्ट है। पावर, लेबर, पैकेजिंग, ट्रासंपोर्टेशन और मशीनरी के रखरखाव की कॉस्टिंग बढऩे के बीच फिनिश्ड ऑयल के मार्केट में रेट्स को लेकर कड़ा मुकाबला है। बड़े ब्रांडों के साथ प्रतिस्पर्धा में स्थानीय मिलों के लिए कॉस्ट को कंट्रोल रखना मुश्किल होता जा रहा है। एडिबल ऑयल इंडस्ट्री की पूरी इकोनॉमी केवल ऑयल तक सीमित नहीं है। सरसों की पेराई से निकलने वाली खली कैटल फीड इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण रॉ-मटेरियल है। इसलिए मिलों के प्रोडक्शन में कमी का असर कैटल फीड कारोबार और संबंधित परिवहन गतिविधियों पर भी पड़ता है। राज्य में सरसों की खली की डिमांड दूसरे राज्यों में भी है।
नीति और मार्केट दोनों पर नजर : ऑयल मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष पारस जैन के अनुसार इंडस्ट्री को रॉ-मटेरियल की उपलब्धता के साथ ऐसी नीतिगत व्यवस्था चाहिए, जिससे स्थानीय स्तर पर एग्री उपज के प्रोसेसिंग को बढ़ावा मिले। यदि राजस्थान में पैदा होने वाली सरसों और मूंगफली का अधिक हिस्सा राज्य में ही प्रोसेस हो, तो किसानों को स्थानीय मार्केट, मिलों को नियमित रॉ-मटेरियल और राज्य को अतिरिक्त वेल्यू एडिशन मिल सकता है। निवाई के तेल कारोबारियों की डिमांड है कि सरकार स्थानीय ऑयल मिलों की समस्याओं का अध्ययन कर रॉ-मटेरियल की उपलब्धता, लागत और कारोबारी नियमों को लेकर राहत का रास्ता निकाले। उनका मानना है कि जिस निवाई का नाम कभी क्वालिटी युक्त सरसों और मूंगफली के एडिबल ऑयल के लिए प्रमुखता से लिया जाता था। ऑयल मिलों को 50 फीसदी कैपेसिटी पर सिमटने से बचाना जरूरी है। इसके लिए प्रोडक्शन से लेकर मार्केट तक पूरी श्रृंखला को मजबूत करने की जरूरत है। निवाई में 30 ऑयल मिलें कार्यरत है, जिसमें से 5 ऑयल मिलें मूंगफली बेस्ड है बाकी ऑयल मिले सरसों बेस्ड है। निवाई बेस्ड ऑयल मिलों की प्रोडक्शन कैपेसिटी प्रतिदिन 1000 मीट्रिक टन की है, लेकिन वर्तमान में प्रोडक्शन यूटिलाइजेशन आधे से भी कम रह गया है।