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12-10-2026

बायोडीजल की बढ़ती डिमांड से महंगा हो सकता है एडिबल ऑयल

  •  भारत में एडिबल ऑयल की कीमतों में तेजी आम लोगों के लिए नई टेंशन बन सकती है। ग्लोबल मार्केट में पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल की कीमतें बढऩे से भारत के इंपोर्ट बिल पर दबाव बढ़ रहा है। इसका असर आने वाले समय में किचन के बजट पर भी पड़ सकता है। युद्ध के कारण सप्लाई में रुकावट, मौसम में बदलाव और बायोडीजल बनाने के लिए एडिबल ऑयल की बढ़ती डिमांड इस तेजी के बड़े कारण हैं। ग्लोबल मार्केट में एडिबल ऑयल की कीमतों में तेजी का एक बड़ा कारण बायोडीजल की बढ़ती डिमांड है। इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे बड़े पाम ऑयल उत्पादक देश अब एडिबल ऑयल का ज्यादा इस्तेमाल बायोडीजल बनाने में कर रहे हैं। इंडोनेशिया ने जुलाई 2026 में डीजल में बायोडीजल मिलाने का लक्ष्य बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया। इससे देश में पाम ऑयल की खपत बढ़ेगी और दूसरे देशों को एक्सपोर्ट के लिए कम तेल मिल सकता है। अनुमान है कि इस बदलाव से इंडोनेशिया में हर साल 47 लाख टन अतिरिक्त पाम ऑयल की खपत हो सकती है। क्रूड ऑयल की कीमतें बढऩे पर बायोडीजल बनाना भी ज्यादा फायदेमंद हो जाता है। ऐसे में एडिबल ऑयल का इस्तेमाल केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एनर्जी सेक्टर में भी इसकी डिमांड बढ़ जाती है। यही वजह है कि ग्लोबल मार्केट में एडिबल ऑयल की सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। मौसम का बदलता मिजाज भी इस पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकता है। अल नीनो के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया में बारिश कम होने और तापमान बढऩे से पाम ऑयल की फसल पर असर पडऩे का खतरा है। इसका असर तुरंत नहीं दिखता, बल्कि पेड़ों की पैदावार में कमी आने में 8 से 12 महीने लग सकते हैं। अनुमान के मुताबिक, इंडोनेशिया में पाम ऑयल का प्रोडक्शन 2026 में 5.85 करोड़ टन से घटकर 2027 में 5.66 करोड़ टन रह सकता है। यानी एक तरफ घरेलू खपत बढ़ रही है और दूसरी तरफ प्रोडक्शन में कमी की आशंका है। भारत के लिए यह स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी एडिबल ऑयल की जरूरत का बड़ा हिस्सा इंपोर्ट से पूरा करता है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, 2026-27 में भारत का घरेलू एडिबल ऑयल प्रोडक्शन 97 लाख टन से घटकर 92 लाख टन रह सकता है। वहीं, इंपोर्ट 1.68 करोड़ टन से बढक़र 1.72 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें करीब 82 लाख टन पाम ऑयल, 50 लाख टन सोयाबीन ऑयल और 35 लाख टन सनफ्लावर ऑयल शामिल हो सकता है। इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भरता का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढऩे का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। विदेश से तेल महंगा आने पर कंपनियों की लागत बढ़ती है और इसका असर घरेलू बाजार की कीमतों पर भी दिख सकता है। ऐसे में आम परिवारों के लिए खाने-पीने का बजट संभालना मुश्किल हो सकता है। एडिबल ऑयल की महंगाई के पीछे अब सिर्फ फसल की कमी नहीं, बल्कि बायोडीजल की बढ़ती डिमांड, युद्ध और मौसम का असर भी है। भारत के लिए घरेलू तिलहन का प्रोडक्शन बढ़ाना और इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना जरूरी है। यदि ग्लोबल मार्केट में कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में एडिबल ऑयल की महंगाई आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ा सकती है।

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बायोडीजल की बढ़ती डिमांड से महंगा हो सकता है एडिबल ऑयल

 भारत में एडिबल ऑयल की कीमतों में तेजी आम लोगों के लिए नई टेंशन बन सकती है। ग्लोबल मार्केट में पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल की कीमतें बढऩे से भारत के इंपोर्ट बिल पर दबाव बढ़ रहा है। इसका असर आने वाले समय में किचन के बजट पर भी पड़ सकता है। युद्ध के कारण सप्लाई में रुकावट, मौसम में बदलाव और बायोडीजल बनाने के लिए एडिबल ऑयल की बढ़ती डिमांड इस तेजी के बड़े कारण हैं। ग्लोबल मार्केट में एडिबल ऑयल की कीमतों में तेजी का एक बड़ा कारण बायोडीजल की बढ़ती डिमांड है। इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे बड़े पाम ऑयल उत्पादक देश अब एडिबल ऑयल का ज्यादा इस्तेमाल बायोडीजल बनाने में कर रहे हैं। इंडोनेशिया ने जुलाई 2026 में डीजल में बायोडीजल मिलाने का लक्ष्य बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया। इससे देश में पाम ऑयल की खपत बढ़ेगी और दूसरे देशों को एक्सपोर्ट के लिए कम तेल मिल सकता है। अनुमान है कि इस बदलाव से इंडोनेशिया में हर साल 47 लाख टन अतिरिक्त पाम ऑयल की खपत हो सकती है। क्रूड ऑयल की कीमतें बढऩे पर बायोडीजल बनाना भी ज्यादा फायदेमंद हो जाता है। ऐसे में एडिबल ऑयल का इस्तेमाल केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एनर्जी सेक्टर में भी इसकी डिमांड बढ़ जाती है। यही वजह है कि ग्लोबल मार्केट में एडिबल ऑयल की सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। मौसम का बदलता मिजाज भी इस पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकता है। अल नीनो के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया में बारिश कम होने और तापमान बढऩे से पाम ऑयल की फसल पर असर पडऩे का खतरा है। इसका असर तुरंत नहीं दिखता, बल्कि पेड़ों की पैदावार में कमी आने में 8 से 12 महीने लग सकते हैं। अनुमान के मुताबिक, इंडोनेशिया में पाम ऑयल का प्रोडक्शन 2026 में 5.85 करोड़ टन से घटकर 2027 में 5.66 करोड़ टन रह सकता है। यानी एक तरफ घरेलू खपत बढ़ रही है और दूसरी तरफ प्रोडक्शन में कमी की आशंका है। भारत के लिए यह स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी एडिबल ऑयल की जरूरत का बड़ा हिस्सा इंपोर्ट से पूरा करता है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, 2026-27 में भारत का घरेलू एडिबल ऑयल प्रोडक्शन 97 लाख टन से घटकर 92 लाख टन रह सकता है। वहीं, इंपोर्ट 1.68 करोड़ टन से बढक़र 1.72 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें करीब 82 लाख टन पाम ऑयल, 50 लाख टन सोयाबीन ऑयल और 35 लाख टन सनफ्लावर ऑयल शामिल हो सकता है। इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भरता का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढऩे का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। विदेश से तेल महंगा आने पर कंपनियों की लागत बढ़ती है और इसका असर घरेलू बाजार की कीमतों पर भी दिख सकता है। ऐसे में आम परिवारों के लिए खाने-पीने का बजट संभालना मुश्किल हो सकता है। एडिबल ऑयल की महंगाई के पीछे अब सिर्फ फसल की कमी नहीं, बल्कि बायोडीजल की बढ़ती डिमांड, युद्ध और मौसम का असर भी है। भारत के लिए घरेलू तिलहन का प्रोडक्शन बढ़ाना और इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना जरूरी है। यदि ग्लोबल मार्केट में कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में एडिबल ऑयल की महंगाई आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ा सकती है।


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