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09-10-2026

नदियों, माइनिंग और एग्रीकल्चर की निगरानी के लिए सरकार इस्तेमाल करेगी नई सैटेलाइट तस्वीरें

  •  राज्य सरकार अब नदियों, खनन, कृषि और जमीन में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए नई और उच्च-रिजॉल्यूशन वाली सैटेलाइट तस्वीरें इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग विभिन्न सैटेलाइट डेटा प्रदाताओं से ये तस्वीरें हासिल करने की प्रक्रिया में है। इनमें अंतरराष्ट्री एजेंसियां भी शामिल हैं, जिनसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो से सूचीबद्ध संस्थाओं के माध्यम से डेटा लिया जाएगा। विभाग ने नवीनतम सैटेलाइट तस्वीरें हासिल करने के लिए निविदा जारी की है। अधिकारियों को उम्मीद है कि नया डेटा जनवरी 2026 तक उपलब्ध हो सकता है। हालांकि, दिए गए समय के अनुसार यह समयसीमा जनवरी 2027 की होनी चाहिए या नहीं, इसकी आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। नई सैटेलाइट तस्वीरों को संसाधित करने के बाद राजधरा के जरिए उपलब्ध कराया जाएगा। राजधरा राज्य सरकार का सैटेलाइट और भौगोलिक डेटा संग्रह मंच है। इसके माध्यम से अलग-अलग सरकारी विभाग अपनी जरूरत के अनुसार इस डेटा का इस्तेमाल कर सकेंगे। 2014-15 की तस्वीरों से होगी तुलना : फिलहाल राजस्थान सरकार के पास वर्ष 2014-15 की सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध हैं। नई तस्वीरें आने के बाद पुराने और नए डेटा की तुलना की जा सकेगी। इससे जमीन के इस्तेमाल, नदी के बहाव और भौतिक संरचनाओं में समय के साथ हुए बदलावों का अधिक सटीक आकलन करने में मदद मिलेगी। सरकारी अधिकारी के मुताबिक, जल संसाधन विभाग के लिए यह डेटा खास तौर पर उपयोगी होगा। सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से नदी की धाराओं और उनके आसपास के क्षेत्रों का नक्शा तैयार किया जा सकेगा। इसके अलावा नदी के रास्ते में हुए बदलाव और संभावित अतिक्रमण की भी पहचान की जा सकेगी। पुराने और नए सैटेलाइट डेटा की तुलना से यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि किसी स्थान पर बदलाव कब और कहां हुआ। इससे प्रशासन के लिए अतिक्रमण या नदी क्षेत्र में अन्य बदलावों की पहचान करना आसान हो सकता है। रिकॉर्ड से मिलान के बाद मौके पर जांच : नई सैटेलाइट तस्वीरें बड़े इलाकों की ताजा स्थिति सामने रखेंगी। अधिकारी इन तस्वीरों की तुलना सरकार के मौजूदा रिकॉर्ड से करेंगे। जहां रिकॉर्ड व जमीन की वास्तविक स्थिति में अंतर दिखाई देगा, वहां संबंधित स्थानों की पहचान कर टीमों को जांच के लिए भेजा जा सकेगा। इससे सैटेलाइट डेटा को सीधे कार्रवाई का आधार बनाने के बजाय पहले जमीनी स्तर पर सत्यापन करने की व्यवस्था मजबूत होगी। एग्री और माइनिंग विभाग को भी फायदा : नई तस्वीरों का इस्तेमाल सिर्फ जल संसाधन विभाग तक सीमित नहीं रहेगा। कृषि विभाग सैटेलाइट डेटा के जरिए जमीन और फसलों का विश्लेषण कर सकेगा। इससे बड़े क्षेत्रों में खेती की स्थिति और भूमि उपयोग में बदलाव की निगरानी में मदद मिलेगी। इसी तरह खनन विभाग संभावित खनन क्षेत्रों की पहचान के लिए इस डेटा का इस्तेमाल कर सकेगा। हालांकि, सैटेलाइट तस्वीरों से किसी क्षेत्र की पहचान हो जाने मात्र से वहां खनन की अनुमति नहीं मिलेगी। अधिकारियों के मुताबिक, ऐसे निष्कर्षों का जमीनी सत्यापन जरूरी होगा और सभी गतिविधियों को सरकार के निर्धारित नियमों एवं वैधानिक मंजूरियों के अनुरूप ही किया जाएगा। नई सैटेलाइट तस्वीरों से राजस्थान सरकार को एक दशक से अधिक पुराने डेटा की तुलना में राज्य की वर्तमान भौगोलिक स्थिति की ज्यादा स्पष्ट तस्वीर मिलने की उम्मीद है। इससे नदी संरक्षण, भूमि उपयोग, कृषि निगरानी और खनन गतिविधियों पर निगरानी को तकनीकी आधार मिल सकता है।

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नदियों, माइनिंग और एग्रीकल्चर की निगरानी के लिए सरकार इस्तेमाल करेगी नई सैटेलाइट तस्वीरें

 राज्य सरकार अब नदियों, खनन, कृषि और जमीन में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए नई और उच्च-रिजॉल्यूशन वाली सैटेलाइट तस्वीरें इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग विभिन्न सैटेलाइट डेटा प्रदाताओं से ये तस्वीरें हासिल करने की प्रक्रिया में है। इनमें अंतरराष्ट्री एजेंसियां भी शामिल हैं, जिनसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो से सूचीबद्ध संस्थाओं के माध्यम से डेटा लिया जाएगा। विभाग ने नवीनतम सैटेलाइट तस्वीरें हासिल करने के लिए निविदा जारी की है। अधिकारियों को उम्मीद है कि नया डेटा जनवरी 2026 तक उपलब्ध हो सकता है। हालांकि, दिए गए समय के अनुसार यह समयसीमा जनवरी 2027 की होनी चाहिए या नहीं, इसकी आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। नई सैटेलाइट तस्वीरों को संसाधित करने के बाद राजधरा के जरिए उपलब्ध कराया जाएगा। राजधरा राज्य सरकार का सैटेलाइट और भौगोलिक डेटा संग्रह मंच है। इसके माध्यम से अलग-अलग सरकारी विभाग अपनी जरूरत के अनुसार इस डेटा का इस्तेमाल कर सकेंगे। 2014-15 की तस्वीरों से होगी तुलना : फिलहाल राजस्थान सरकार के पास वर्ष 2014-15 की सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध हैं। नई तस्वीरें आने के बाद पुराने और नए डेटा की तुलना की जा सकेगी। इससे जमीन के इस्तेमाल, नदी के बहाव और भौतिक संरचनाओं में समय के साथ हुए बदलावों का अधिक सटीक आकलन करने में मदद मिलेगी। सरकारी अधिकारी के मुताबिक, जल संसाधन विभाग के लिए यह डेटा खास तौर पर उपयोगी होगा। सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से नदी की धाराओं और उनके आसपास के क्षेत्रों का नक्शा तैयार किया जा सकेगा। इसके अलावा नदी के रास्ते में हुए बदलाव और संभावित अतिक्रमण की भी पहचान की जा सकेगी। पुराने और नए सैटेलाइट डेटा की तुलना से यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि किसी स्थान पर बदलाव कब और कहां हुआ। इससे प्रशासन के लिए अतिक्रमण या नदी क्षेत्र में अन्य बदलावों की पहचान करना आसान हो सकता है। रिकॉर्ड से मिलान के बाद मौके पर जांच : नई सैटेलाइट तस्वीरें बड़े इलाकों की ताजा स्थिति सामने रखेंगी। अधिकारी इन तस्वीरों की तुलना सरकार के मौजूदा रिकॉर्ड से करेंगे। जहां रिकॉर्ड व जमीन की वास्तविक स्थिति में अंतर दिखाई देगा, वहां संबंधित स्थानों की पहचान कर टीमों को जांच के लिए भेजा जा सकेगा। इससे सैटेलाइट डेटा को सीधे कार्रवाई का आधार बनाने के बजाय पहले जमीनी स्तर पर सत्यापन करने की व्यवस्था मजबूत होगी। एग्री और माइनिंग विभाग को भी फायदा : नई तस्वीरों का इस्तेमाल सिर्फ जल संसाधन विभाग तक सीमित नहीं रहेगा। कृषि विभाग सैटेलाइट डेटा के जरिए जमीन और फसलों का विश्लेषण कर सकेगा। इससे बड़े क्षेत्रों में खेती की स्थिति और भूमि उपयोग में बदलाव की निगरानी में मदद मिलेगी। इसी तरह खनन विभाग संभावित खनन क्षेत्रों की पहचान के लिए इस डेटा का इस्तेमाल कर सकेगा। हालांकि, सैटेलाइट तस्वीरों से किसी क्षेत्र की पहचान हो जाने मात्र से वहां खनन की अनुमति नहीं मिलेगी। अधिकारियों के मुताबिक, ऐसे निष्कर्षों का जमीनी सत्यापन जरूरी होगा और सभी गतिविधियों को सरकार के निर्धारित नियमों एवं वैधानिक मंजूरियों के अनुरूप ही किया जाएगा। नई सैटेलाइट तस्वीरों से राजस्थान सरकार को एक दशक से अधिक पुराने डेटा की तुलना में राज्य की वर्तमान भौगोलिक स्थिति की ज्यादा स्पष्ट तस्वीर मिलने की उम्मीद है। इससे नदी संरक्षण, भूमि उपयोग, कृषि निगरानी और खनन गतिविधियों पर निगरानी को तकनीकी आधार मिल सकता है।


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