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21-07-2026

रिसर्च में खुलासा : राजस्थान का ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ बना पॉल्यूशन का हॉटस्पॉट

  •  पहली नजर में किसी बर्फीली जगह सा लगने वाला यह नजारा पर्यटकों को काफी लुभाता है। इसे राजस्थान का ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ भी कहा जाता है। अजमेर जिले के किशनगढ़ से महज 3-4 किलोमीटर दूर स्थित यह जगह असल में मार्बल डंपिंग यार्ड है, जो यहां आने वाले टूरिस्ट की पहली पसंद है, लेकिन यही टूरिस्ट प्लेस अब पॉल्युशन का हॉटस्पॉट भी बन चुका है। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय की रिसर्च में सामने आया है कि इस टूरिस्ट स्पॉट का पॉल्यूशन लेवल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की निर्धारित सीमा से 4 से 12 गुना है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अनुशंसित सीमा से 20 से 50 गुना अधिक पॉल्यूशन पाया गया। शोध का नेतृत्व करने वाले राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा ने बताया कि यह पहला अध्ययन है, जिसमें मार्बल वेस्ट निस्तारण स्थान के 15 किलोमीटर के दायरे में सिंचित और वर्षा आधारित एग्रीकल्चर भूमि, भूजल और वायु गुणवत्ता का आकलन किया गया। इसके साथ ही परमाणु अवशोषण स्पेक्ट्रोस्कोपी (एएएस) तकनीक से प्रदूषकों की सांद्रता और एक्स-रे विवर्तन (एक्सआरडी) विश्लेषण के माध्यम से प्रदूषण के खनिजीय स्वरूप का अध्ययन किया गया। प्रोफेसर शर्मा ने कहा, ‘‘पीएम 2.5 का स्तर सीपीसीबी की सीमा से 4 से 12 गुना और डब्ल्यूएचओ की अनुशंसित सीमा से 20 से 50 गुना अधिक पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि मार्बल प्रोसेसिंग युनिट्स के आसपास लोग लंबे समय तक सांस के जरिए बेहद सूक्ष्म धूल कणों के संपर्क में रहते हैं। सबसे अधिक पॉल्युशन उस समय दर्ज किया गया, जब इंडस्ट्रीयल एक्टीविटीज चरम पर थी और तेज सतही हवाएं चल रही थीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उडऩे वाली मार्बल धूल प्रदूषण का प्रमुख स्त्रोत है। सर्वेक्षण में 53 प्रतिशत स्थानीय निवासियों और 70 प्रतिशत मार्बल उद्योग के श्रमिकों ने सांस लेने में कठिनाई की शिकायत की, जबकि 56 से 84 प्रतिशत लोगों ने गले से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताया। करीब 350 एकड़ में फैले इस स्थान पर प्रतिदिन 700 से अधिक टैंकर द्वारा लगभग 22 लाख लीटर मार्बल स्लरी (मार्बल का अपशिष्ट घोल) डाली जाती है। अपने बर्फ जैसे सफेद और आकर्षक स्वरूप के कारण यह स्थान ‘प्री-वेडिंग फोटोशूट’, कमर्शियल शूटिंग और टूरिज्म के लिए बेहद लोकप्रिय हो गया है। यहां प्रतिदिन करीब 5,000 टूरिस्ट आते हैं, जबकि सप्ताहांत और छुट्टियों में यह संख्या 20,000 तक पहुंच जाती है। हालांकि, पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे न केवल एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम, बल्कि अत्यधिक प्रदूषण वाला स्थान भी बताया है। शोध के सह-लेखक और राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी शोधार्थी बसंत बिजारणिया ने बताया कि अध्ययन के दौरान आसपास की मिट्टी और भूजल में भारी धातुएं पाई गई और उनकी सांद्रता अपशिष्ट निपटान स्थान से दूरी बढऩे के साथ घटती गई। उन्होंने कहा, ‘यह स्थानिक पैटर्न स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मार्बल वेस्ट स्थानीय स्तर पर भारी धातु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है।’

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रिसर्च में खुलासा : राजस्थान का ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ बना पॉल्यूशन का हॉटस्पॉट

 पहली नजर में किसी बर्फीली जगह सा लगने वाला यह नजारा पर्यटकों को काफी लुभाता है। इसे राजस्थान का ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ भी कहा जाता है। अजमेर जिले के किशनगढ़ से महज 3-4 किलोमीटर दूर स्थित यह जगह असल में मार्बल डंपिंग यार्ड है, जो यहां आने वाले टूरिस्ट की पहली पसंद है, लेकिन यही टूरिस्ट प्लेस अब पॉल्युशन का हॉटस्पॉट भी बन चुका है। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय की रिसर्च में सामने आया है कि इस टूरिस्ट स्पॉट का पॉल्यूशन लेवल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की निर्धारित सीमा से 4 से 12 गुना है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अनुशंसित सीमा से 20 से 50 गुना अधिक पॉल्यूशन पाया गया। शोध का नेतृत्व करने वाले राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा ने बताया कि यह पहला अध्ययन है, जिसमें मार्बल वेस्ट निस्तारण स्थान के 15 किलोमीटर के दायरे में सिंचित और वर्षा आधारित एग्रीकल्चर भूमि, भूजल और वायु गुणवत्ता का आकलन किया गया। इसके साथ ही परमाणु अवशोषण स्पेक्ट्रोस्कोपी (एएएस) तकनीक से प्रदूषकों की सांद्रता और एक्स-रे विवर्तन (एक्सआरडी) विश्लेषण के माध्यम से प्रदूषण के खनिजीय स्वरूप का अध्ययन किया गया। प्रोफेसर शर्मा ने कहा, ‘‘पीएम 2.5 का स्तर सीपीसीबी की सीमा से 4 से 12 गुना और डब्ल्यूएचओ की अनुशंसित सीमा से 20 से 50 गुना अधिक पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि मार्बल प्रोसेसिंग युनिट्स के आसपास लोग लंबे समय तक सांस के जरिए बेहद सूक्ष्म धूल कणों के संपर्क में रहते हैं। सबसे अधिक पॉल्युशन उस समय दर्ज किया गया, जब इंडस्ट्रीयल एक्टीविटीज चरम पर थी और तेज सतही हवाएं चल रही थीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उडऩे वाली मार्बल धूल प्रदूषण का प्रमुख स्त्रोत है। सर्वेक्षण में 53 प्रतिशत स्थानीय निवासियों और 70 प्रतिशत मार्बल उद्योग के श्रमिकों ने सांस लेने में कठिनाई की शिकायत की, जबकि 56 से 84 प्रतिशत लोगों ने गले से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताया। करीब 350 एकड़ में फैले इस स्थान पर प्रतिदिन 700 से अधिक टैंकर द्वारा लगभग 22 लाख लीटर मार्बल स्लरी (मार्बल का अपशिष्ट घोल) डाली जाती है। अपने बर्फ जैसे सफेद और आकर्षक स्वरूप के कारण यह स्थान ‘प्री-वेडिंग फोटोशूट’, कमर्शियल शूटिंग और टूरिज्म के लिए बेहद लोकप्रिय हो गया है। यहां प्रतिदिन करीब 5,000 टूरिस्ट आते हैं, जबकि सप्ताहांत और छुट्टियों में यह संख्या 20,000 तक पहुंच जाती है। हालांकि, पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे न केवल एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम, बल्कि अत्यधिक प्रदूषण वाला स्थान भी बताया है। शोध के सह-लेखक और राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी शोधार्थी बसंत बिजारणिया ने बताया कि अध्ययन के दौरान आसपास की मिट्टी और भूजल में भारी धातुएं पाई गई और उनकी सांद्रता अपशिष्ट निपटान स्थान से दूरी बढऩे के साथ घटती गई। उन्होंने कहा, ‘यह स्थानिक पैटर्न स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मार्बल वेस्ट स्थानीय स्तर पर भारी धातु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है।’


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