किसी व्यक्ति के लिये मनुष्य जीवन पा लेना ही पर्याप्त नहीं है। यदि किसी को जीना नहीं आये तो जीवन मृत्यु समान है। आज बहुत सारे लोगों के पास प्रचुर धन, वैभव, आकर्षक मोटर-कारों का समूह है लेकिन फिर भी उनके मन में शान्ति नहीं है। खाते तो दो समय दो रोटियां ही हंै, लेकिन पेट मटका बन गया है। जरा विचार करें कि आपने सुविधा सम्पन्न जीवन जी कर क्या किया है? नशा, लोभ, मोह, माया, अपना-पराया आदि के साथ सारा जीवन तो नष्ट कर दिया, अब जो बचा है, क्या उसे सुधारना नहीं चाहेंगेे? जीवन से न मोह-माया व अहंकार का त्याग कर सके, न मानवता के संस्कारों को अपनाया। कल तक जहां खड़े थे, आज भी वहीं पर हैं। हमें समझना होगा कि धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा पाना ही जीवन का सच्चा सुख नहीं है। कुछ समय अपनी आत्मा में देखने का प्रयास करें। आप दिनभर जितने अच्छे-बुरे कार्य करते हैं, सोने से पहले एक बार उनका विश£ेषण अवश्य करें। तब आपको पता चलेगा कि आपने सही मायनें में जीवन जिया है या नहीं। किसी के लिये जीवन का असली मूल्य क्या है? संत विद्वानों ने कहा है कि जीवन का सही मायने में सच्चा अर्थ समझना हो, जीवन को करीब से देखना हो तो किसी अस्पताल में जा कर देखिये। जो भूख से तड़प रहा है, सर्दी-गर्मी से शरीर को बचाने का प्रयास कर रहा है। जो जीवन के लिये संघर्ष कर रहा है, उससे पूछिये जीवन का महत्व क्या होता है। जो दुर्घटना से अभी उभरा ही है, तनिक उससे पूछिये कि जीवन के मायने क्या होते हैं। जिनके पास प्रचुर धन, समृद्धि, वैभव व सुख है, उनको क्या पता, क्या है जीवन का मौल। जैन धर्म में जीने की दो पद्धतियां बतायी गयी हैं, एक वह है जिसमें जीव जड़ होकर जीता है तथा दूसरी वह है जिसमें जीव चैतन्य बन कर जीता है। आपने देखा होगा कि जिसके पास प्रचुर धन, ऐश्वर्य, वैभव है, वह भी बहुत दु:खी है। लोग केवल रुपया-पैसा कमाकर ही सुखी नहीं रह सकते। आपके पास पैसा है और बड़ी गाड़ी से जा रहे हैं। रास्ते में किसी व्यक्ति पर आप दानस्वरुप कुछ दया कर देते हैं और घर पहुंचते ही सबसे पहले अपनी पत्नी को बढ़ाचढ़ा कर बताते हैं कि आज वह क्या तीर मारकर आया है। जानते हैं, आपने क्या किया? आपने अपने आप को अपनी ही नजरों से गिरा लिया। इसका अनुभव कब होगा जब आप कभी याचक होंगे और दूसरा व्यक्ति दाता होगा। आपकी इस क्रिया में अहंकार का समावेश था जिसके कारण आपका कर्म व्यर्थ चला गया। रामायण में कहा गया है-
हाड़ माँस को देह मम, तापर जितनी प्रीति।
तिसु आधो जो राम प्रति, अवसि मिटिहि भवभीति।।
संतों का कहना है कि मनुष्य धन, लोभ, मोह, माया की मृगमरिचिका के कारण भ्रमित है। गीता में कहा गया है कि यदि आप संसार के दुर्लभ सुखों का अनुभव करना चाहते हैं, स्वाधीनता चाहते हैं, अमरत्व चाहते हैं तो संसार से संबंध बनाने की बजाय, संबंध विच्छेद करने का प्रयास करें। जो कर्म आप अपने व परिवार के लिये कर रहे हैं, दूसरों के लिये भी करने का प्रयास करें। ईश्वर ने जीवन आपको दिया है लेकिन दूसरों के लिये भी जीयें। हम जानते हैं कि ढंडे पानी का घड़ा कुम्हार अपने लिये नहीं बनाता, सुनार अपने लिये आभूषण नहीं घड़ता बल्कि दूसरों के गले के लिये तैयार करता है। जो जीवन हमें मिला है, जिसके रहते हम रात-दिन सहस्त्र अच्छे बुरे कर्म करते हैं, यह तो ईश्वर की कृपा का प्रसाद है। यह जान व समझ लीजिये कि आगे जो कुछ भी होगा, उसकी नींव आपको आज ही रखनी होगी। संसार का सबसे कटु व अटल सत्य मृत्यु है। व्यक्ति बूढ़ा हो गया, नेत्रों से दिखायी नहीं पड़ता, टांगों से चला नहीं जाता, दांतों से भोजन चबता नहीं तथा पेट से पचता नहीं है। शरीर आत्मा पर बोझ बनकर रह गया है। फिर भी उसके सारे प्रयास-उपक्रम मृत्यु को टालने के होते हैं। संतों ने कहा है कि ऋण मुक्त हुए बिना व जीवन का भार उतारे बिना यमलोक जाना सबसे खराब मृत्यु है। शास्त्रों में तीन प्रकार के ऋणों का वर्णन है जिनकों उतार कर ही मनुष्य आत्मा के बोझ दूर कर सकता है। इस लिये ईश्वर ने जो जीवन दिया है, उसे त्याग के साथ आनन्दपूर्वक जीने की चेष्टा करनी चाहिए।