जोधपुर जूती यानी पारंपरिक मोजड़ी शिल्पकला को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआई टैग मिल गया है, जिससे 200 साल पुरानी इस कला को नई पहचान मिलेगी। इससे कारीगरों को लाभ होगा और नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और करीब 200 वर्ष पुराने इस उद्योग का घरेलू बाजार वर्तमान में लगभग 100 करोड़ रुपये का है, जबकि एक्सपोर्ट करीब 10 करोड़ रुपये का है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जीआई टैग मिलने के बाद विदेशी बाजारों में जोधपुरी मोजरी की मांग तेजी से बढ़ेगी और अगले दो वर्षों में कारोबार दोगुना हो सकता है। यह प्रमाण पत्र जोधपुर हैंडीक्राफ्ट्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन और ग्राम विकास सेवा संस्थान, पीपाड़ सिटी के नाम पर जारी हुआ है। भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री चेन्नई ने ‘मोजड़ी क्राफ्ट ऑफ जोधपुर (राजस्थान)’ को जीआई संख्या 735 के तहत प्रमाणपत्र जारी किया है। जोधपुर हैंडीक्राफ्ट्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भरत दिनेश ने बताया कि मोजड़ी को जीआई टैग मिलने से अब जोधपुर की पारंपरिक कला को देश-विदेश में विशिष्ट पहचान मिलेगी। इससे स्थानीय कारीगरों, हस्तशिल्प उद्योग और एक्सपोर्ट को प्रोत्साहन मिलेगा। मारवाड़ में आकर्षक मोजड़ी बनाने का काम करीब 200 वर्ष पुराना है और यह लगभग पूरे मारवाड़ में फैला हुआ है। यहीं से अलग-अलग क्षेत्रों में जूती बनाने के काम का प्रसार माना जाता है। जीआई टैग से ई-कॉमर्स कंपनियां इसमें रुचि दिखाएंगी। मोजड़ी को जीआई टैग दिलाने के लिए 4 जनवरी, 2021 से प्रक्रिया शुरू हुई थी। जोधपुर के प्रतापनगर इलाके में अपने घर से ही मोजड़ी बनाने वाले महेंद्र सोनगरा ने ‘एमआर जोधपुर’ के नाम से पहचान बनाई है। देश की बड़ी प्रदर्शनियों में उनकी कला का प्रदर्शन हुआ है. इनके द्वारा बनाई गई कशीदाकारी जूती का पेटेंट आईआईटी जोधपुर के सहयोग से 2023 में प्राप्त हुआ है। महेंद्र राजस्थान के पहले जूती निर्माता हैं जिनको यह पेटेंट मिला है। अब मोजड़ी को जीआई टैग मिलने से कारीगरों के दिन बहुरेंगे। जोधपुरी बंधेज को पहले ही जीआई टैग मिल चुका है, जिसके बाद उसके कारोबार में लगभग 25 फीसदी तक वृद्धि दर्ज की गई थी। अब जोधपुरी साफा, मथानिया की लाल मिर्च, वुडन एंड आयरन क्राफ्ट, मारवाड़ का जीरा, जोधपुरी सेंड स्टोन की छतरियां और लहरिया सहित कई उत्पादों के लिए भी जीआई टैग की प्रक्रिया जारी है।