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15-05-2026

ऑइल शॉक का रिस्क, इंडिया का ऑइल डिमांड 20 परसेंट घटाने का टार्गेट

  •  क्रूड ऑइल की प्राइस में तेजी और ग्लोबल एनर्जी सप्लाई क्राइसिस के खतरे को देखते हुए भारत सरकार देश में फ्यूल कंजम्पशन को स्वैच्छिक तरीके से 20 परसेंट तक घटाने की तैयारी कर रही है। सरकारी सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्ट के अनुसार फ्यूल डिमांड में स्वैच्छिक रूप से 20 परसेंट कटौती के लिए सरकार पब्लिक मूवमेंट खड़ा करना चाहती है। इसका मकसद फिलहाल तेज की बचत करना नहीं बल्कि एक व्यापक जनआंदोलन खड़ा करना है, ताकि भारत वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और एनर्जी मार्केट के झटकों से बेहतर तरीके से निपट सके। सरकार का प्लान पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाना, कार-पूलिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने, गुड्स मूवमेंट के लिए रेल नेटवर्क के इस्तेमाल और वर्क-फ्रॉम -होम जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना शामिल है। सरकार मानती है कि यदि लोग स्वेच्छा से तेल की खपत घटाते हैं तो भारत के इंपोर्ट बिल और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा। यह कदम ऐसे समय आया है जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ब्लॉकेज के कारण सप्लाई घट रही है। इन दोनों के असर के कारण ग्लोबल मार्केट्स में चिंता बढ़ रही है। वेस्ट एशिया में चल रहे इस भू-राजनीतिक तनाव के कारण कई देश फ्यूल बचाने और डिमांड मैनेजमेंट के कदम उठा रहे हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यदि फ्यूल की ग्लोबल डिमांड में 3-4 परसेंट की कमी आ जाती है तो फ्यूल प्राइस को स्थिर करने में मदद मिलेगी। ऐसे में यदि इंडिया अपनी घरेलू खपत को कंट्रोल करता है तो फ्यूल की ग्लोबल डिमांड पर प्रेशर घटेगा औरे ऑइस प्राइस को ठंडा करने में मदद मिल सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से इंपोर्टेड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल सिर्फ आवश्यकता के अनुसार करने की अपील की है। प्रधानमंत्री ने कोविड काल की कई आदतों को फिर अपनाने की बात कही, जिनमें वर्क-फ्रॉम-होम, ऑनलाइन मीटिंग और वर्चुअल कॉन्फ्रेंस शामिल हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार फ्यूल डिमांड घटने से विदेशी मुद्रा भंडार और महंगे तेल की कीमतों से इकोनॉमी को बचाने में मदद मिलेगी।  हालांकि सरकार का मन कोविड की तरह कड़े निर्देश देने का नहीं है बल्कि आमजन को अपनी इच्छा से फ्यूल की खपत घटाने के लिए प्रेरित करने का है। एनेलिस्ट्स का मानना है कि यदि वेस्ट एशिया संकट लंबा खिंचता है और तेल की महंगाई बनी रहती है तो भारत को अपने चालू खाते के घाटे, महंगाई और रुपये पर बढ़ते दबाव से निपटने के लिए और सख्त मांग-प्रबंधन उपाय अपनाने पड़ सकते हैं।

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ऑइल शॉक का रिस्क, इंडिया का ऑइल डिमांड 20 परसेंट घटाने का टार्गेट

 क्रूड ऑइल की प्राइस में तेजी और ग्लोबल एनर्जी सप्लाई क्राइसिस के खतरे को देखते हुए भारत सरकार देश में फ्यूल कंजम्पशन को स्वैच्छिक तरीके से 20 परसेंट तक घटाने की तैयारी कर रही है। सरकारी सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्ट के अनुसार फ्यूल डिमांड में स्वैच्छिक रूप से 20 परसेंट कटौती के लिए सरकार पब्लिक मूवमेंट खड़ा करना चाहती है। इसका मकसद फिलहाल तेज की बचत करना नहीं बल्कि एक व्यापक जनआंदोलन खड़ा करना है, ताकि भारत वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और एनर्जी मार्केट के झटकों से बेहतर तरीके से निपट सके। सरकार का प्लान पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाना, कार-पूलिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने, गुड्स मूवमेंट के लिए रेल नेटवर्क के इस्तेमाल और वर्क-फ्रॉम -होम जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना शामिल है। सरकार मानती है कि यदि लोग स्वेच्छा से तेल की खपत घटाते हैं तो भारत के इंपोर्ट बिल और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा। यह कदम ऐसे समय आया है जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ब्लॉकेज के कारण सप्लाई घट रही है। इन दोनों के असर के कारण ग्लोबल मार्केट्स में चिंता बढ़ रही है। वेस्ट एशिया में चल रहे इस भू-राजनीतिक तनाव के कारण कई देश फ्यूल बचाने और डिमांड मैनेजमेंट के कदम उठा रहे हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यदि फ्यूल की ग्लोबल डिमांड में 3-4 परसेंट की कमी आ जाती है तो फ्यूल प्राइस को स्थिर करने में मदद मिलेगी। ऐसे में यदि इंडिया अपनी घरेलू खपत को कंट्रोल करता है तो फ्यूल की ग्लोबल डिमांड पर प्रेशर घटेगा औरे ऑइस प्राइस को ठंडा करने में मदद मिल सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से इंपोर्टेड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल सिर्फ आवश्यकता के अनुसार करने की अपील की है। प्रधानमंत्री ने कोविड काल की कई आदतों को फिर अपनाने की बात कही, जिनमें वर्क-फ्रॉम-होम, ऑनलाइन मीटिंग और वर्चुअल कॉन्फ्रेंस शामिल हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार फ्यूल डिमांड घटने से विदेशी मुद्रा भंडार और महंगे तेल की कीमतों से इकोनॉमी को बचाने में मदद मिलेगी।  हालांकि सरकार का मन कोविड की तरह कड़े निर्देश देने का नहीं है बल्कि आमजन को अपनी इच्छा से फ्यूल की खपत घटाने के लिए प्रेरित करने का है। एनेलिस्ट्स का मानना है कि यदि वेस्ट एशिया संकट लंबा खिंचता है और तेल की महंगाई बनी रहती है तो भारत को अपने चालू खाते के घाटे, महंगाई और रुपये पर बढ़ते दबाव से निपटने के लिए और सख्त मांग-प्रबंधन उपाय अपनाने पड़ सकते हैं।


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