प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पेट्रोल-डीजल, गोल्ड और फॉरेन ट्रेवल पर अचानक पैनिक बटन दबा देने से नई डिबेट शुरू हो गई है। क्रूड़ ऑइल 108 डॉलर और डॉलर के मुकाबले रुपया 95 पार हो जाना देश के लिए डबल व्हैमी यानी दोहरी ही नहीं करारी मार है। एनेलिस्ट कहते हैं कि कि करंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) देश की जेब जला देगा। करंट अकाउंट डेफिसिट यानी फॉरेन करेंसी इन्फ्लो (एक्सपोर्ट, एफडीआई और एफपीआई) और आउटफ्लो (इंपोर्ट बढऩा और एफडीआई और एफपीआई निकलना आदि) का अंतर। जब इंपोर्ट बिल बढ़ता है तो करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ता है। चूंकि एफडीआई और एफपीआई दोनों ही घट रहे हैं इसलिए डॉलर आने का कोई जरिया नहीं है। आरबीआई के अनुसार वित्त वर्ष 26 की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में सीएडी 13.2 बिलियन डॉलर यानी जीडीपी का 1.3 परसेंट था, जबकि जनवरी-मार्च तिमाही में यह 11.5 बिलियन डॉलर था। चालू वित्त वर्ष में भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट (डॉलर इनकम में से डॉलर पेमेंट घटाना) 70 बिलियन डॉलर के घाटे तक पहुंच सकता है, जो वित्त वर्ष 26 में केवल 28 बिलियन डॉलर ही था।
तेल का खेल : वित्त वर्ष 26 में भारत ने कुल पेट्रोलियम प्रोडक्ट इंपोर्ट बिल 174.9 बिलियन डॉलर (16.44 लाख करोड़) खर्च किए, जो देश के कुल इंपोर्ट बिल का 22 परसेंट था। 1 जनवरी 2026 को क्रूड ऑइल 70 डॉलर प्रति बैरल था। जो अब 13 मई को 108 डॉलर हो गया वहीं जनवरी में डॉलर 84 रुपये का था जो अब 95 रुपये का है। यानी क्रूड ऑइल भी महंगा हो रहा है और रुपया भी टूट रहा है। पिछले 10 सप्ताह में तीनों सरकारी ऑइल कंपनियों का कुल घाटा 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। केंद्र सरकार ने प्राइस बढऩे से रोकने के लिए पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 3 रुपये कर दी जबकि डीजल पर 10 रुपये से घटाकर जीरो। इससे सरकार को हर महीने लगभग 14 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
गोल्ड का गड्ढा : प्रधानमंत्री ने पेट्रोल-डीजल का कंजम्पशन घटाने की बात कही है। लेकिन...गोल्ड 1 साल तक न खरीदने को कहा है। क्योंकि जहां पेट्रोल डीजल देश की इकोनॉमी के लिए फ्यूल हैं वहीं गोल्ड इंपोर्ट इकोनॉमी में गड्ढा कर रहा है। महंगा गोल्ड आप खरीदते हैं और तिजोरी में बंद कर देते हैं। यानी जो पैसा सिस्टम में जाना चाहिए था वो गोल्ड इंपोर्ट के नाम पर डॉलर के रूप में देश सेउड़ गया। एलकेपी सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी के अनुसार तेल खरीदना मजबूरी है लेकिन गोल्ड...। वित्त वर्ष 26 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 24 परसेंट बढक़र रिकॉर्ड 71.98 बिलियन डॉलर (6.77 लाख करोड़) पर पहुंच गया, जो वित्त वर्ष 25 में 58 बिलियन डॉलर (5.45 लाख करोड़) था। वित्त वर्ष 24 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 45.54 बिलियन डॉलर (4.28 लाख करोड़) और वित्त वर्ष 23 में 35 अरब डॉलर (3.29 लाख करोड़) था। यहां यह बात ध्यान देने की है कि वित्त वर्ष 25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट (बिल) 24 परसेंट बढ़ गया लेकिन इंपोर्ट वॉल्यूम 4.76 परसेंट घटकर 721.03 टन रह गया। यदि गोल्ड इंपोर्ट घट जाए तो भारत को इंपोर्ट पेमेंट के लिए डॉलर की जरूरत कम पड़ेगी यानी रुपया अपने-आप मजबूत हो जाएगा। वित्त वर्ष 2012-13 में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट लगभग 80 बिलियन डॉलर था, जिसमें लगभग 60 बिलियन डॉलर अकेले गोल्ड इंपोर्ट के कारण था। रिपोटर््स के अनुसार भारतीय परिवारों के पास लगभग 35 हजार टन फैमिली गोल्ड है लेकिन तिजोरी में बंद है और औपचारिक अर्थव्यवस्था के बाहर डेड असैट है। यदि 1 टन फैमिली गोल्ड को रिसाइकल किया जाता तो देश को 95 मिलियन डॉलर यानी 893 करोड़ रुपये के इंपोर्ट की बचत हो सकती है यानी इतने डॉलर बाहर नहीं जाएंगे। एनेलिस्ट्स के अनुसार प्रधानमंत्री ने ऑइल और गोल्ड को लेकर जो अपील की है वो क्राइसिस मैनेजमेंट के एक्शन की शुरुआत है।
फॉरेन ट्रेवल : तीसरी बात, प्रधानमंत्री ने फॉरेन ट्रेवल कम करने की अपील की। आरबीआई के अनुसार के अनुसार वित्त वर्ष26 के अप्रैल-फरवरी के 11 महीनों में फॉरेन ट्रेवल पर 15.34 बिलियन डॉलर खर्च किए। आउटबाउंड टूरिज्म (फॉरेन ट्रेवल) फॉरेन करेंसी आउटफ्लो का बड़ा जरिया बन गया है। आपको भरोसा नहीं होगा कि भारत जैसे गरीब देश से हर साल 3.5 करोड़ हिंदुस्तानी सैर-सपाटे के लिए विदेश जा रहे हैं। यानी ऑइल इंपोर्ट, गोल्ड इंपोर्ट और लीजर इंपोर्ट (फॉरेन ट्रेवल) मिलकर भारत सरकार के सामने बड़ा चैलेंज बन चुके हैं।


