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06-05-2026

...आखिर कब तक रहेगा India में Consumption Slowdown?

  •  इंडियन इकोनॉमी को अगर एक कहानी की तरह पढ़ें, तो उसका सबसे मजबूत किरदार हमेशा से ‘कंजंप्शन’ रहा है। यही वो इंजन है जो ग्रोथ को आगे बढ़ाता है, कंपनियों को कमाने का मौका देता है और आम लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही इंजन थोड़ा धीमा पड़ता दिख रहा है। बाज़ार में चर्चा है कि कंजंप्शन अब पहले जैसा नहीं रहा-लोग कम खर्च कर रहे हैं, डिमांड कमजोर है, और ग्रोथ की रफ्तार थम सी गई है। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है, या हम केवल कहानी के एक हिस्से को देखकर निष्कर्ष निकाल रहे हैं? अगर हम पीछे मुडक़र देखें, तो इंडिया की कंजंप्शन ग्रोथ कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं चली। वित्तीय वर्ष 2006 से वित्तीय वर्ष 2014 का दौर एक शानदार फेज था, जब प्राइवेट कंजंप्शन लगभग 15' सालाना की तेज रफ्तार से बढ़ रहा थी। यह वह समय था जब इनकम बढ़ रही था, डिमांड मजबूत थी और इकॉनमी एक हाई-ग्रोथ ट्रेजेक्टरी पर थी। लेकिन फिर 2008 का ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस आया, जिसने इस रफ्तार को झटका दिया। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने इकॉनमी को बचाने के लिए बड़ा स्टिमुलस दिया, लेकिन इसका असर यह हुआ कि इन्फ्लेशन बढ़ गई, खासकर ऑयल प्राइस के कारण। धीरे-धीरे यह इम्बैलेंस इतना बढ़ा कि वित्तीय वर्ष 2013-14 में बैलेंस ऑफ पेमेंट्स क्राइसिस और फिस्कल दबाव ने कंजंप्शन को रीसेट करने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद जो दौर आया, वह और भी चुनौतीपूर्ण था। डिमोनेटाइजेशन, आईएलएफएस क्राइसिस और कोविड जैसे  शॉक्स ने कंजंप्शन की स्पीड को और धीमा कर दिया। वित्तीय वर्ष 2018 के बाद प्राइवेट फाइनल कंजंप्शन एक्सपेंडिचर की ग्रोथ औसतन लगभग 10.4% सालाना रह गई, जो अब तक की सबसे धीमी ग्रोथ रेट है। पहली नजर में यह तस्वीर चिंताजनक लगती है, लेकिन अगर हम इसे थोड़ा गहराई से समझें, तो यह स्लोडाउन एक स्थायी कमजोरी नहीं, बल्कि एक साइक्लिकल फेज का हिस्सा नजर आता है। असल में, कंजंप्शन की प्रकृति ही साइक्लिकल होती है। कभी यह तेजी से बढ़ता है, तो कभी दबाव में आ जाता है। साथ में दिए गए डेटा को देखें, तो अलग-अलग दशकों में कंजंप्शन ग्रोथ लगातार ऊपर-नीचे होती रही है-कभी 17 प्रतिशत से ऊपर, तो कभी शून्य के आसपास। इसका मतलब यह है कि आज जो स्लोडाउन हम देख रहे हैं, वह इस साइकिल का निचला हिस्सा हो सकता है, न कि अंत। वर्तमान स्लोडाउन के पीछे कुछ स्पष्ट कारण भी हैं। इनकम ग्रोथ उतनी तेज नहीं है, जितनी पहले थी। हाउसिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में सुस्ती है, जिससे रोजगार और डिमांड दोनों प्रभावित हो रहे हैं। लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स भी पूरी तरह से रिकवरी नहीं दिखा रहे, जिससे व्यापक स्तर पर इनकम जनरेशन कमजोर पड़ा है। इन सबका असर यह हुआ कि मास कंजंप्शन दबाव में आ गया। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कंजंप्शन पूरी तरह से गायब नहीं हुआ है। अर्बन और हाई-इनकम वर्ग अभी भी खर्च कर रहे हैं, प्रीमियम गुड्स की डिमांड बनी हुई है और क्रेडिट ग्रोथ ने कंजंप्शन को सहारा दिया है। इसका मतलब यह है कि खपत खत्म नहीं हुई है, बल्कि अनइवन हो गई है-कुछ हिस्सों में मजबूत और कुछ में कमजोर। सबसे बड़ी गलती यही होगी कि हम इस स्लोडाउन को स्थायी मान लें। हर इकॉनमिक साइकिल में ऐसे फेज आते हैं, जब ग्रोथ धीमी लगती है और भविष्य अनिश्चित नजर आता है। लेकिन यही फेज अगले एक्सपैंशन की नींव भी रखते हैं।

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...आखिर कब तक रहेगा India में Consumption Slowdown?

 इंडियन इकोनॉमी को अगर एक कहानी की तरह पढ़ें, तो उसका सबसे मजबूत किरदार हमेशा से ‘कंजंप्शन’ रहा है। यही वो इंजन है जो ग्रोथ को आगे बढ़ाता है, कंपनियों को कमाने का मौका देता है और आम लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही इंजन थोड़ा धीमा पड़ता दिख रहा है। बाज़ार में चर्चा है कि कंजंप्शन अब पहले जैसा नहीं रहा-लोग कम खर्च कर रहे हैं, डिमांड कमजोर है, और ग्रोथ की रफ्तार थम सी गई है। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है, या हम केवल कहानी के एक हिस्से को देखकर निष्कर्ष निकाल रहे हैं? अगर हम पीछे मुडक़र देखें, तो इंडिया की कंजंप्शन ग्रोथ कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं चली। वित्तीय वर्ष 2006 से वित्तीय वर्ष 2014 का दौर एक शानदार फेज था, जब प्राइवेट कंजंप्शन लगभग 15' सालाना की तेज रफ्तार से बढ़ रहा थी। यह वह समय था जब इनकम बढ़ रही था, डिमांड मजबूत थी और इकॉनमी एक हाई-ग्रोथ ट्रेजेक्टरी पर थी। लेकिन फिर 2008 का ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस आया, जिसने इस रफ्तार को झटका दिया। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने इकॉनमी को बचाने के लिए बड़ा स्टिमुलस दिया, लेकिन इसका असर यह हुआ कि इन्फ्लेशन बढ़ गई, खासकर ऑयल प्राइस के कारण। धीरे-धीरे यह इम्बैलेंस इतना बढ़ा कि वित्तीय वर्ष 2013-14 में बैलेंस ऑफ पेमेंट्स क्राइसिस और फिस्कल दबाव ने कंजंप्शन को रीसेट करने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद जो दौर आया, वह और भी चुनौतीपूर्ण था। डिमोनेटाइजेशन, आईएलएफएस क्राइसिस और कोविड जैसे  शॉक्स ने कंजंप्शन की स्पीड को और धीमा कर दिया। वित्तीय वर्ष 2018 के बाद प्राइवेट फाइनल कंजंप्शन एक्सपेंडिचर की ग्रोथ औसतन लगभग 10.4% सालाना रह गई, जो अब तक की सबसे धीमी ग्रोथ रेट है। पहली नजर में यह तस्वीर चिंताजनक लगती है, लेकिन अगर हम इसे थोड़ा गहराई से समझें, तो यह स्लोडाउन एक स्थायी कमजोरी नहीं, बल्कि एक साइक्लिकल फेज का हिस्सा नजर आता है। असल में, कंजंप्शन की प्रकृति ही साइक्लिकल होती है। कभी यह तेजी से बढ़ता है, तो कभी दबाव में आ जाता है। साथ में दिए गए डेटा को देखें, तो अलग-अलग दशकों में कंजंप्शन ग्रोथ लगातार ऊपर-नीचे होती रही है-कभी 17 प्रतिशत से ऊपर, तो कभी शून्य के आसपास। इसका मतलब यह है कि आज जो स्लोडाउन हम देख रहे हैं, वह इस साइकिल का निचला हिस्सा हो सकता है, न कि अंत। वर्तमान स्लोडाउन के पीछे कुछ स्पष्ट कारण भी हैं। इनकम ग्रोथ उतनी तेज नहीं है, जितनी पहले थी। हाउसिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में सुस्ती है, जिससे रोजगार और डिमांड दोनों प्रभावित हो रहे हैं। लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स भी पूरी तरह से रिकवरी नहीं दिखा रहे, जिससे व्यापक स्तर पर इनकम जनरेशन कमजोर पड़ा है। इन सबका असर यह हुआ कि मास कंजंप्शन दबाव में आ गया। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कंजंप्शन पूरी तरह से गायब नहीं हुआ है। अर्बन और हाई-इनकम वर्ग अभी भी खर्च कर रहे हैं, प्रीमियम गुड्स की डिमांड बनी हुई है और क्रेडिट ग्रोथ ने कंजंप्शन को सहारा दिया है। इसका मतलब यह है कि खपत खत्म नहीं हुई है, बल्कि अनइवन हो गई है-कुछ हिस्सों में मजबूत और कुछ में कमजोर। सबसे बड़ी गलती यही होगी कि हम इस स्लोडाउन को स्थायी मान लें। हर इकॉनमिक साइकिल में ऐसे फेज आते हैं, जब ग्रोथ धीमी लगती है और भविष्य अनिश्चित नजर आता है। लेकिन यही फेज अगले एक्सपैंशन की नींव भी रखते हैं।


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