भारत ने हाल ही जितने भी एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) किए हैं उन सभी में एक बात कॉमन है और वो है भारत के स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए वीजा कोटा बढ़ाना। यूरोप से लेकर पूर्वी एशिया तक के देशों में वैसे भी आबादी घट रही है ऐसे में हम पढ़े-लिखे हिंदुस्तानी रियल असैट साबित हो रहे हैं। भारत के लिए भी ये असैट ही हैं क्योंकि मॉर्गन स्टेनले ने अपनी रिपोर्ट में कहा है रेमिटेंस (प्रवासी धन) के दम पर भारत ग्लोबल शॉक को झेलने के लिहाज से मजबूत हो गया है। मॉर्गन स्टैनली इंडिया इकोनॉमिक्स एंड स्ट्रैटेजी की रिपोर्ट.... अपॉर्चुनिटीज एंड रिस्कस अमिड कॉन्फ्लिक्ट्स... के अनुसार, भारत को वित्त वर्ष 2024 में लगभग 120 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त हुआ था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढक़र करीब 138 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। विदेशों में बसे हिंदुस्तानी जो पैसा भारत भेजते हैं (रेमिटेंस) वो भारत के कुल गुड्स ट्रेड डेफिसिट की लगभग 40-45' भरपाई कर देता है। और यह ईरान वॉर जैसे शॉक से भारत के लिए बड़े शॉक अब्जॉर्बर (झटके के असर को कम करने वाला) साबित हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की रेमिटेंस इनकम में बड़ा स्ट्रक्चरल शिफ्ट भी दिख रहा है। वित्त वर्ष 2016-17 में भारत के कुल रेमिटेंस में जीसीसी यानी खाड़ी देशों का शेयर लगभग 47 परसेंट थी, जो 2023-24 में घटकर करीब 38 परसेंट रह गया। इसी दौरान डवलप्ड देशों का शेयर लगभग 30 परसेंट से बढक़र 42 परसेंट हो गया। अब 27.7 परसेंट शेयर के साथ अमेरिका भारत का सबसे बड़ा सोर्स है जबकि 19.2 परसेंट के साथ यूएई दूसरे स्थान पर है। मॉर्गन स्टेनले के अनुसार पिछले सालों में डवलप्ड देशों का शेयर बढऩे से भारत का रेमिटेंस कंपोनेंट पहले से अधिक मजबूत हो गया है क्योंकि यहां खाड़ी देशों की तरह कमोडिटी प्राइस और वॉर आदि का असर नहीं होता। खाड़ी के देशों में भारतीय समुदाय ज्यादातर कन्सट्रक्शन और सर्विस सेक्टर में सेमी स्किल्ड काम करता है जबकि डवलप्ड देशों में हाई स्किल और हाई इनकम वाले वाइट कॉलर प्रोफेशन में। हालांकि जिस तरह से गल्फवॉर ने यूएई, कतर, बहरीन और सऊदी अरब में बिजनस एक्टिविटी को नुकसान पहुंचाया है जिससे भारत की रेमिटेंस इनकम में फौरी कमी आ सकती है लेकिन वॉर ठंडा पड़ते ही खाड़ी में बड़े पैमाने पर इंवेस्टमेंट होने की उम्मीद है जिससे भारत की रेमिटेंस इनकम में भी तेज बढ़ोतरी हो सकती है। मॉर्गन स्टैनली के मुताबिक अब कुल रेमिटेंस का आधे से अधिक हिस्सा डवलप्ड देशों अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया से आ रहा है।
