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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

07-05-2026

जियोपॉलिटिकल तनाव से बदला सेक्टर रोटेशन का खेल

  •  पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब अलग-अलग सेक्टरों पर साफ दिख रहा है। एक तरफ एल्युमिनियम की कीमतों में तेजी आई है, वहीं सीमेंट सेक्टर दबाव में नजर आ रहा है। इसकी बड़ी वजह बढ़ती फ्यूल कॉस्ट और सप्लाई को लेकर चिंता है।अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान एल्युमिनियम स्प्रेड बढक़र 2,547 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया। स्प्रेड का मतलब बिक्री कीमत और कॉस्ट के बीच का अंतर होता है। सप्लाई को लेकर बढ़ी चिंता और ऊर्जा कीमतों में उछाल से एल्युमिनियम कंपनियों को फायदा मिला। वहीं सीमेंट स्प्रेड घटकर 2,981 रुपये प्रति टन पर आ गया। फ्यूल महंगा होने से सीमेंट कंपनियों की कॉस्ट बढ़ गई, लेकिन कंपनियां तुरंत कीमतें नहीं बढ़ा पाईं। इसका असर उनके मार्जिन पर पड़ा। 28 फरवरी को तनाव शुरू होने के बाद नाल्को के शेयर करीब 13 प्रतिशत बढ़े हैं, जबकि हिंडाल्को में लगभग 12 प्रतिशत की तेजी आई है। दूसरी तरफ अंबुजा सीमेंट के शेयर 11 प्रतिशत से ज्यादा टूटे हैं। श्री सीमेंट में 7 प्रतिशत, डालमिया भारत में 4 प्रतिशत और रामको सीमेंट में करीब 17 प्रतिशत की गिरावट आई है।

    ऐसा क्यों हो रहा है? :  एल्युमिनियम सेक्टर पूरी दुनिया के बाजार से जुड़ा है।  कारोबार में बिजली और फ्यूल की कॉस्ट बहुत अहम होती है। जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो ऊर्जा महंगी हो जाती है और सप्लाई प्रभावित होती है। इससे एल्युमिनियम की कीमतें बढ़ती हैं। दूसरी तरफ सीमेंट कारोबार घरेलू मांग पर ज्यादा निर्भर करता है। फ्यूल महंगा होने से कंपनियों की कॉस्ट बढ़ जाती है। अगर वे तुरंत कीमत नहीं बढ़ा पातीं, तो मुनाफा घटने लगता है।

    पहले भी दिखा था ऐसा ट्रेंड : रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी यही ट्रेंड देखने को मिला था। उस समय सीमेंट स्प्रेड गिरकर 2,651 रुपये प्रति टन तक पहुंच गया था, जो 2016 के बाद सबसे निचला स्तर था। वहीं साल के आखिर तक एल्युमिनियम स्प्रेड बढक़र 1,294 डॉलर प्रति टन हो गया था।

    आगे क्या हो सकता है? : विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दुनिया में तनाव कम होता है और फ्यूल सस्ता होने लगता है, तो सीमेंट कंपनियों को राहत मिल सकती है। वहीं एल्युमिनियम की कीमतों में नरमी आ सकती है। हालांकि जानकार मानते हैं कि निवेशकों को सिर्फ इसी ट्रेंड के भरोसे फैसला नहीं लेना चाहिए। कंपनी की कमाई, मांग और कारोबार की स्थिति जैसी दूसरी चीजों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

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जियोपॉलिटिकल तनाव से बदला सेक्टर रोटेशन का खेल

 पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब अलग-अलग सेक्टरों पर साफ दिख रहा है। एक तरफ एल्युमिनियम की कीमतों में तेजी आई है, वहीं सीमेंट सेक्टर दबाव में नजर आ रहा है। इसकी बड़ी वजह बढ़ती फ्यूल कॉस्ट और सप्लाई को लेकर चिंता है।अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान एल्युमिनियम स्प्रेड बढक़र 2,547 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया। स्प्रेड का मतलब बिक्री कीमत और कॉस्ट के बीच का अंतर होता है। सप्लाई को लेकर बढ़ी चिंता और ऊर्जा कीमतों में उछाल से एल्युमिनियम कंपनियों को फायदा मिला। वहीं सीमेंट स्प्रेड घटकर 2,981 रुपये प्रति टन पर आ गया। फ्यूल महंगा होने से सीमेंट कंपनियों की कॉस्ट बढ़ गई, लेकिन कंपनियां तुरंत कीमतें नहीं बढ़ा पाईं। इसका असर उनके मार्जिन पर पड़ा। 28 फरवरी को तनाव शुरू होने के बाद नाल्को के शेयर करीब 13 प्रतिशत बढ़े हैं, जबकि हिंडाल्को में लगभग 12 प्रतिशत की तेजी आई है। दूसरी तरफ अंबुजा सीमेंट के शेयर 11 प्रतिशत से ज्यादा टूटे हैं। श्री सीमेंट में 7 प्रतिशत, डालमिया भारत में 4 प्रतिशत और रामको सीमेंट में करीब 17 प्रतिशत की गिरावट आई है।

ऐसा क्यों हो रहा है? :  एल्युमिनियम सेक्टर पूरी दुनिया के बाजार से जुड़ा है।  कारोबार में बिजली और फ्यूल की कॉस्ट बहुत अहम होती है। जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो ऊर्जा महंगी हो जाती है और सप्लाई प्रभावित होती है। इससे एल्युमिनियम की कीमतें बढ़ती हैं। दूसरी तरफ सीमेंट कारोबार घरेलू मांग पर ज्यादा निर्भर करता है। फ्यूल महंगा होने से कंपनियों की कॉस्ट बढ़ जाती है। अगर वे तुरंत कीमत नहीं बढ़ा पातीं, तो मुनाफा घटने लगता है।

पहले भी दिखा था ऐसा ट्रेंड : रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी यही ट्रेंड देखने को मिला था। उस समय सीमेंट स्प्रेड गिरकर 2,651 रुपये प्रति टन तक पहुंच गया था, जो 2016 के बाद सबसे निचला स्तर था। वहीं साल के आखिर तक एल्युमिनियम स्प्रेड बढक़र 1,294 डॉलर प्रति टन हो गया था।

आगे क्या हो सकता है? : विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दुनिया में तनाव कम होता है और फ्यूल सस्ता होने लगता है, तो सीमेंट कंपनियों को राहत मिल सकती है। वहीं एल्युमिनियम की कीमतों में नरमी आ सकती है। हालांकि जानकार मानते हैं कि निवेशकों को सिर्फ इसी ट्रेंड के भरोसे फैसला नहीं लेना चाहिए। कंपनी की कमाई, मांग और कारोबार की स्थिति जैसी दूसरी चीजों पर भी ध्यान देना जरूरी है।


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