मार्च 2026 के क्वार्टर ने भारतीय शेयर बाजार में एक बड़ा बदलाव दिखाया है—और ये बदलाव सिर्फ नंबरों का नहीं, बल्कि निवेश के तरीके और सोच का भी है। जहां एक तरफ विदेशी निवेशकों और प्रमोटर्स की हिस्सेदारी कई साल के निचले स्तर पर पहुंच गई, वहीं दूसरी तरफ घरेलू निवेशकों और म्यूचुअल फंड्स का दबदबा लगातार बढ़ता नजर आया। सबसे पहले बात करें छोटे निवेशकों और हाई नेटवर्थ निवेशकों की, तो एनएसई पर लिस्टेड कंपनियों में मार्च 2026 क्वार्टर के दौरान इनकी हिस्सेदारी घटकर 5 साल के निचले स्तर 9.11% पर आ गई है। दिसंबर 2025 में यह 9.28% थी। छोटे निवेशकों की हिस्सेदारी 7.25% से घटकर 7.12% और हाई नेटवर्थ निवेशकों की हिस्सेदारी 2.03'% से घटकर 1.99% रह गई। इस दौरान इन निवेशकों ने करीब 13,134 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की, जो यह दिखाता है कि सीधे शेयर बाजार में उनका भरोसा थोड़ा कम हुआ है। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।जहां सीधे निवेश में गिरावट आई, वहीं म्यूचुअल फंड्स के जरिए निवेश तेजी से बढ़ा है। घरेलू म्यूचुअल फंड्स की हिस्सेदारी बढक़र 11.46% के अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। यह लगातार 11वां क्वार्टर है जब इसमें बढ़ोतरी हुई है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अब निवेशक खुद शेयर चुनने के बजाय प्रोफेशनल फंड मैनेजर के जरिए निवेश करना ज्यादा सुरक्षित और समझदारी भरा मान रहे हैं। अगर पुराने आंकड़ों से तुलना करें, तो मार्च 2012 में म्यूचुअल फंड्स की हिस्सेदारी सिर्फ 3.21% थी, जबकि अब यह 11% से ज्यादा हो चुकी है। वहीं व्यक्तिगत निवेशकों की हिस्सेदारी लगभग स्थिर ही रही है। यानी निवेश का तरीका बदल गया है—सीधे निवेश से हटकर अब लोग परोक्ष निवेश की ओर बढ़ रहे हैं। अब बात करें विदेशी संस्थागत निवेशकों की, तो उनकी हिस्सेदारी गिरकर 14 साल के निचले स्तर 16.13% पर पहुंच गई है। दिसंबर 2025 में यह 16.60% थी। इसके उलट, घरेलू संस्थागत निवेशक लगातार मजबूत हो रहे हैं। उनकी हिस्सेदारी बढक़र 19.24% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इस क्वार्टर में उन्होंने करीब 2.51 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया। इसमें म्यूचुअल फंड्स का सबसे बड़ा योगदान रहा, जहां सिस्टेमेटिक निवेश योजनाओं के जरिए लगातार पैसा आता रहा। अब स्थिति यह है कि घरेलू संस्थागत निवेशक, छोटे निवेशक और हाई नेटवर्थ निवेशक मिलकर कुल 28.34% हिस्सेदारी रखते हैं—जो अब तक का सबसे ज्यादा स्तर है। इसका मतलब है कि अब बाजार की दिशा तय करने में घरेलू निवेशकों की भूमिका बेहद मजबूत हो चुकी है। सेक्टर के स्तर पर देखें तो घरेलू संस्थागत निवेशकों ने हेल्थकेयर में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि आईटी में कटौती की। वहीं विदेशी निवेशकों ने कमोडिटीज में निवेश बढ़ाया और फाइनेंशियल सेक्टर में थोड़ा हाथ खींचा। प्रमोटर्स की बात करें तो निजी प्रमोटर्स की हिस्सेदारी घटकर 9 साल के निचले स्तर 40.58% पर आ गई है। पिछले चार साल में इसमें बड़ी गिरावट देखी गई है।
