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01-05-2026

‘आत्मनिर्भर’ भारत और चीन से इंपोर्ट की आदत

  •  एक छोटी सी कहानी है। भारत को बुलट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए टनल बोरिंग मशीन की जरूरत थी। उस डायामीटर की मशीन का भारत ने जर्मनी की कंपनी को ऑर्डर दे दिया। कंपनी ने शिपमेंट चीन के पोर्ट पर पहुंचा दी। लेकिन चीन ने कस्टम क्लीयरेंस ही नहीं दिया कोई 1 साल तक। कंपनी की चिरोरी और भारत सरकार द्वारा टॉप डिप्लोमेटिक लेवल पर कॉन्टेक्ट करने के बावजूद चीन नहीं हिला। आपको याद होगा ब्रिक्स की मीटिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल सितंबर में चीन गए थे, तब जाकर चीन ने टीबीएम के शिपमेंट को क्लीयर किया। ये भारत की वो कमजोर रग हैं जो विकसित और आत्मनिर्भर भारत के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा हैं। ऐसे ही कोविड के दौरान ताईवान से चिप सप्लाई डिसरप्ट क्या हुई इंडिया में ऑटो और ड्यूरेबल्स की मैन्युफैक्चरिंग पस्त हो गई। गलवान संघर्ष के दौरान चीन की सप्लाई चेन से एक हद तक डीलिंक हो जाने का नुकसान भारत झेल चुका है। क्रिटिकल मीनरल का एक्सपोर्ट बैन कर चीन ने हाल ही चैलेंज खड़ा कर दिया था। होरमुज शिपिंग चैनल बंद होना तो आइसिंग ऑन द केक है जिसने पूरे जनमानस को अपनी चपेट में ले लिया है। चायना+1 स्ट्रेटेजी में भारत कहां फिट हो रहा है यह तो समय बताएगा लेकिन भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स इंपोर्ट 100 बिलियन डॉलर का है इसमें ज्यादातर वो कंपोनेंट हैं जो भारत में स्मार्टफोन, टीवी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स की मैन्युफैक्चरिंग के लिए क्रिटिकल इनपुट हैं। चीन ने टूंटी बंद की नहीं कि भारत में सब ठप हो जाएगा। जीटीआरआई का डेटा कहता है कि भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि देश के इंडस्ट्रियल गुड्स इंपोर्ट में चीन का शेयर 30 परसेंट है और भारत-चीन के रिश्ते में ट्रस्ट डेफिसिट (भरोसे की कमी) बहुत है। विकसित भारत के मिशन के लिए चीन पर बढ़ती निर्भरता बहुत गंभीर मामला है क्योंकि चीन से जो इंपोर्ट होता है उसका बड़ा हिस्सा भारत में मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट में इस्तेमाल होता है। यानी मेक इन इंडिया और एक्सपोर्ट दोनों की नब्ज पर चीन ने हाथ रखा हुआ है। वित्त वर्ष 2021 में भारत का चीन से इंपोर्ट $65.2 बिलियन था, जो वित्त वर्ष 2026 में लगभग दोगुना होकर 131.6 बिलियन डॉलर हो गया। इसके उलट चीन को भारत का एक्सपोर्ट वित्त वर्ष 2021 में 21.2 बिलियन डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2026 में केवल 19.5 बिलियन डॉलर रह गया। भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि चीन से कुल इंपोर्ट में लगभग 98.5 परसेंट शेयर इंडस्ट्रियल गुड्स का है।एनेलिस्ट्स के अनुसार चीन से कुल इंपोर्ट का 66 परसेंट यानी करीब $82.6 बिलियन इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और ऑर्गेनिक केमिकल्स जैसे सैक्टर्स में होता है। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स इंपोर्ट का 43 परसेंट, मशीनरी और कंप्यूटर का 40 परसेंट, और ऑर्गेनिक केमिकल्स का 44 परसेंट हिस्सा चीन से आता है और ये भारत के एक्सपोर्ट के लिए नए पावरहाउस साबित हो रहे हैं लेकिन चीन के चेन पुल का खतरा है।

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‘आत्मनिर्भर’ भारत और चीन से इंपोर्ट की आदत

 एक छोटी सी कहानी है। भारत को बुलट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए टनल बोरिंग मशीन की जरूरत थी। उस डायामीटर की मशीन का भारत ने जर्मनी की कंपनी को ऑर्डर दे दिया। कंपनी ने शिपमेंट चीन के पोर्ट पर पहुंचा दी। लेकिन चीन ने कस्टम क्लीयरेंस ही नहीं दिया कोई 1 साल तक। कंपनी की चिरोरी और भारत सरकार द्वारा टॉप डिप्लोमेटिक लेवल पर कॉन्टेक्ट करने के बावजूद चीन नहीं हिला। आपको याद होगा ब्रिक्स की मीटिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल सितंबर में चीन गए थे, तब जाकर चीन ने टीबीएम के शिपमेंट को क्लीयर किया। ये भारत की वो कमजोर रग हैं जो विकसित और आत्मनिर्भर भारत के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा हैं। ऐसे ही कोविड के दौरान ताईवान से चिप सप्लाई डिसरप्ट क्या हुई इंडिया में ऑटो और ड्यूरेबल्स की मैन्युफैक्चरिंग पस्त हो गई। गलवान संघर्ष के दौरान चीन की सप्लाई चेन से एक हद तक डीलिंक हो जाने का नुकसान भारत झेल चुका है। क्रिटिकल मीनरल का एक्सपोर्ट बैन कर चीन ने हाल ही चैलेंज खड़ा कर दिया था। होरमुज शिपिंग चैनल बंद होना तो आइसिंग ऑन द केक है जिसने पूरे जनमानस को अपनी चपेट में ले लिया है। चायना+1 स्ट्रेटेजी में भारत कहां फिट हो रहा है यह तो समय बताएगा लेकिन भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स इंपोर्ट 100 बिलियन डॉलर का है इसमें ज्यादातर वो कंपोनेंट हैं जो भारत में स्मार्टफोन, टीवी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स की मैन्युफैक्चरिंग के लिए क्रिटिकल इनपुट हैं। चीन ने टूंटी बंद की नहीं कि भारत में सब ठप हो जाएगा। जीटीआरआई का डेटा कहता है कि भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि देश के इंडस्ट्रियल गुड्स इंपोर्ट में चीन का शेयर 30 परसेंट है और भारत-चीन के रिश्ते में ट्रस्ट डेफिसिट (भरोसे की कमी) बहुत है। विकसित भारत के मिशन के लिए चीन पर बढ़ती निर्भरता बहुत गंभीर मामला है क्योंकि चीन से जो इंपोर्ट होता है उसका बड़ा हिस्सा भारत में मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट में इस्तेमाल होता है। यानी मेक इन इंडिया और एक्सपोर्ट दोनों की नब्ज पर चीन ने हाथ रखा हुआ है। वित्त वर्ष 2021 में भारत का चीन से इंपोर्ट $65.2 बिलियन था, जो वित्त वर्ष 2026 में लगभग दोगुना होकर 131.6 बिलियन डॉलर हो गया। इसके उलट चीन को भारत का एक्सपोर्ट वित्त वर्ष 2021 में 21.2 बिलियन डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2026 में केवल 19.5 बिलियन डॉलर रह गया। भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि चीन से कुल इंपोर्ट में लगभग 98.5 परसेंट शेयर इंडस्ट्रियल गुड्स का है।एनेलिस्ट्स के अनुसार चीन से कुल इंपोर्ट का 66 परसेंट यानी करीब $82.6 बिलियन इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और ऑर्गेनिक केमिकल्स जैसे सैक्टर्स में होता है। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स इंपोर्ट का 43 परसेंट, मशीनरी और कंप्यूटर का 40 परसेंट, और ऑर्गेनिक केमिकल्स का 44 परसेंट हिस्सा चीन से आता है और ये भारत के एक्सपोर्ट के लिए नए पावरहाउस साबित हो रहे हैं लेकिन चीन के चेन पुल का खतरा है।


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