ब्रेन ड्रेन और रिवर्स फ्लिपिंग नाम आपने सुने होंगे। ब्रेनड्रेन यानी इंडिया का टेलेंट बाहर जाना। रिवर्स फ्लिपिंग यानी किसी स्टार्टअप का अपना रजिस्टर्ड ऑफिस विदेश से भारत में शिफ्ट करना। एक दौर था जब ब्रेन ड्रेन को देश की शान पर बट्टा माना जाता था लेकिन 140 बिलियन डॉलर (करीब 13 लाख करोड़ रुपये) के रेमिटेंस मिल रहे हैं तो सब चंगा सी। वहीं भारत में आईपीओ के जरिए फंडिंग उठाने के लिए स्टार्टअप्स बहुत ज्यादा रिवर्स फ्लिपिंग कर रहे हैं। एआई और डीपटेक कंपनियों की तलाश में एफआईआई भारत से करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं दूसरी ओर भारत में दर्जनों ऐसी डीपटेक कंपनियां हैं जिन्हें इंवेस्टर रेस्पॉन्स नहीं मिलने के कारण ग्लोबल होना पड़ा है। शार्कटेंक इंडिया से एक अंदाजा हो जाता है कि टेक कंपनी में फंडिंग बहुत कम मिलती है वहीं कंज्यूमर गुड्स कंपनी पर शार्क टूटकर पड़ते हैं। बिजनस इमिग्रेशन एनेलिस्ट ओलिविया मिलर ने हाल ही एक पोस्ट लिखी...भारत की इनोवेटिव कंपनियां दलाल स्ट्रीट की बजाय अमेरिका के नैस्डैक में लिस्ट हो रही हैं। वे कहती हैं हार्ट सर्जन डॉ. सुधीर श्रीवास्तव ने अपनी कंपनी एसएसआई इंटरनेशनल के तहत भारत का स्वदेशी सर्जिकल रोबोट डवलप करने में कई साल लगाए। लेकिन भारत में लिस्टिंग की कोशिश की तो रेस्पॉन्स बहुत पूअर मिला। एडवांस्ड सर्जिकल सिस्टम डिजाइन और मैन्युफैक्चर करने वाली यह कंपनी ग्लोबल दिग्गजों से मुकाबला कर रही है लेकिन लिस्ट होने के लिए इसे अमेरिका जाना पड़ गया। ऐसी ही दिल्ली की बायोटेक कंपनी व्योम थेराप्यूटिक्स ने इम्यूनो-इंफ्लेमेटरी रोगों के लिए नई दवाएं डवलप की हैं। लेकिन दलाल स्ट्रीट के बजाय अगस्त 2025 में नैस्डैक पर लिस्ट हुई। एनेलिस्ट कहते हैं कि ये फाउंडर ग्लोबल बनने के लिए विदेशों में लिस्ट नहीं हो रहे हैं बल्कि उन्हें अपने देश में ही इंवेस्टर्स की बेरुखी झेलनी पड़ रही है। भारत में कंज्यूमरटेक, डी2सी ब्रांड, फिनटेक और शाक्र्स की कंपनियां ओवरसब्सक्राइब हो रही हैं। लेकिन डीप टेक और इनोवेटिव कंपनियां बेरुखी झेल रही हैं। भारत का मार्केट बैलेंस सीट, सेल्स विजिबिलिटी और मार्केट अपॉर्चुनिटी के आधार पर वेल्यूएशन करता है। और यहां प्री रेवेन्यू, इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी आधारित वेंचर्स का वेल्यूएशन करने का कोई इकोसिस्टम ही नहीं है। वैसे भी डीप टेक और बायोटेक कंपनियों का रास्ता लंबा और अलग होता है। इनमें आर एंड डी पर भारी इंवेस्टमेंट होता है, पेटेंट और क्लिनिकल ट्रायल चरणों में वेल्यू होती है ना कि एवरेज रन रेट (महीने की औसत सेल्स में) में। इन कंपनियों के लिए ग्लोबल होना कोई ऑप्शन नहीं बल्कि मजबूरी है। इससे वे अमेरिका के स्पेशलिस्ट इंवेस्टर्स तक पहुंच पाती हैं जो लॉन्ग टर्म इनोवेशन पर दांव लगाते हैं। एसएसआई के डॉ. श्रीवास्तव कहते हैं कि सर्जिकल केयर में ग्लोबल रेवॉल्यूशन की लीडरशिप हासिल करने की कोशिश है। हमारा मिशन है कि रोबोटिक सर्जरी को दुनिया भर के मरीजों तक पहुंचाना है। फ्रेशवक्र्स 2010 में भारत में बनी थी लेकिन नैस्डैक लिस्टेड इस कंपनी का वेल्यूएशन 2.5 बिलियन डॉलर है।