भारतीय शेयर बाज़ार में पिछले एक दशक में तेज़ी से विस्तार हुआ है। निवेशकों की संख्या बढ़ी है, ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ा है और नई कंपनियाँ लगातार बाज़ार में आ रही हैं। इस पूरे बदलाव के साथ एक और महत्वपूर्ण ट्रेंड देखने को मिला है- सेबी की इन्वेस्टिगेशन में लगातार वृद्धि। यह केवल एक संयोग नहीं है, बल्कि बाज़ार की बढ़ती गतिविधियों और जटिलता का सीधा परिणाम है। यदि हम 2013-14 से 2024-25 तक के डेटा को देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इन्वेस्टिगेशन की संख्या समय के साथ बढ़ती गई है। 2013-14 में कुल इन्वेस्टिगेशन 108 थीं, जो 2014-15 में घटकर 70 हो गईं, लेकिन इसके बाद एक बढ़ता हुआ ट्रेंड सामने आता है। 2016-17 में इन्वेस्टिगेशन अचानक बढक़र 245 तक पहुँच गईं, जो यह दर्शाता है कि उस समय बाज़ार में गतिविधियाँ और अनियमितताएँ दोनों बढ़ रही थीं। इसके बाद 2018-19 (194) और 2019-20 (161) में भी उच्च स्तर बना रहा। कोविड-19 के दौरान 2020-21 और 2021-22 में इन्वेस्टिगेशन की संख्या घटकर क्रमश: 94 और 59 हो गई, जो यह दिखाता है कि जब आर्थिक गतिविधियाँ धीमी होती हैं, तो बाज़ार में अनियमितताएँ भी कम हो जाती हैं। लेकिन इसके बाद का दौर बेहद महत्वपूर्ण है। 2022-23 में इन्वेस्टिगेशन 144 तक पहुँचीं, 2023-24 में यह तेजी से बढक़र 342 हो गईं और 2024-25 में यह 400 तक पहुँच गईं। यह स्पष्ट संकेत है कि पोस्ट-कोविड बुल मार्केट में न केवल निवेश बढ़ा, बल्कि संदिग्ध गतिविधियाँ भी तेजी से बढ़ीं। डेटा का विश्लेषण करने पर यह भी सामने आता है कि इन्वेस्टिगेशन की प्रकृति में बड़ा बदलाव हुआ है। सबसे बड़ा हिस्सा "Market Manipulation and Price Rigging" से जुड़ा रहा है। उदाहरण के लिए, 2016-17 में इस श्रेणी में 185 मामले थे, जबकि 2023-24 में 160 और 2024-25 में 106 मामले दर्ज किए गए। इसका मतलब है कि तेजी के समय शेयरों की कीमतों को आर्टिफिशियल रूप से प्रभावित करने की कोशिशें अधिक होती हैं। दूसरी ओर, "Insider Trading" से जुड़ी इन्वेस्टिगेशन में सबसे तेज़ वृद्धि देखी गई है। 2013-14 में केवल 13 मामले थे, जो 2018-19 में 70 हो गए। इसके बाद यह संख्या लगातार बढ़ती गई—2022-23 में 85, 2023-24 में 175 और 2024-25 में 287 तक पहुँच गई। यह ट्रेंड काफी चिंताजनक है, क्योंकि यह दर्शाता है कि अंदर की गोपनीय जानकारी का दुरुपयोग बढ़ रहा है। "ssue Related Manipulation" के मामलों में गिरावट देखी गई है। 2015-16 में जहाँ 9 मामले थे, वहीं 2020-21 के बाद यह लगभग शून्य हो गए। इससे संकेत मिलता है कि IPO और इश्यू प्रक्रिया में सेबी की नीतियाँ प्रभावी रही हैं। "Takeovers" से जुड़े मामले हमेशा कम रहे हैं, जबकि "Miscellaneous" श्रेणी में कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव देखा गया, जैसे 2019-20 में 73 मामले, लेकिन बाद में इसमें कमी आई। इस पूरे डेटा से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—जैसे-जैसे बाज़ार का आकार और गतिविधि बढ़ती है, वैसे-वैसे निगरानी और इन्वेस्टिगेशन की आवश्यकता भी बढ़ती है। विशेष रूप से 2022 के बाद का उछाल यह दिखाता है कि तेज़ी के दौर में जोखिम भी तेजी से बढ़ते हैं।
