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11-05-2026

मेक इन इंडिया में अमेरिका और चीन ने लगाया अडंगा

  • दुनिया की टॉप 2 इकोनॉमी अमेरिका और चीन ने इंडिया के मेक इन इंडिया मिशन को पटरी से उतारने के लिए कमर कस ली है। भारत 2030 तक दुनिया की तीसरी बड़ी इकोनॉमी बन जाएगा। अमेरिका और चीन का तर्क है कि भारत गलत तरीके से सब्सिडी देकर इंटरनेशनल ट्रेड के नियमों का उल्लंघन कर रहा है। अमेरिका और चीन दोनों को ही प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (पीएलआई) खटक रही है। मोदी सरकार ने कोविड के दौर में लोकल मैन्युफैक्चरिंग को प्रमोट और सपोर्ट करने के लिए पीएलआई स्कीम शुरू की थी। पीएलआई स्कीम में इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स से लेकर सोलर इक्विपमेंट और मेडिकल डिवाइस तक 14 इंडस्ट्री को कवर करते हुए 1.91 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इन दोनों देशों की शिकायत यह है कि इस तरह की इंसेंटिव स्कीम से इंडिया इंक को प्राइस कंपीटिशन में विदेशी कंपनियों के खिलाफ नाजायज एडवांटेज मिलता है। सोलर इंडस्ट्री में वारी एनर्जी•ा, अडानी एंटरप्राइजेज और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी फम्र्स को पीएलआई के साथ ही तरह-तरह की नॉन टैरिफ सरकारी सुविधाओं से फायदा हुआ है। आप जानते हैं अमेरिका ने फरवरी में मेड इन इंडिया सोलर सैल और मॉड्यूल पर 126' सीवीडी (काउंटरवेलिंग ड्यूटी) लगा दी थी। काउंटरवेलिंग ड्यूटी दरअसल किसी सरकार (जैसे भारत) द्वारा दी जा रही सब्सिडी के एडवांटेज को खत्म करने के लिए लगाई जाती है। अमेरिका का कहना है कि भारत की सोलर इंडस्ट्री को सरकारी सपोर्ट के कारण कॉस्ट एडवांटेज मिल रहा है। एनेलिस्ट कहते हैं कि अमेरिका इस सीवीडी के जरिए भारत में बने सोलर सैल और मॉड्यूल्स को प्राइस आउट (महंगा) करना चाहता है ताकि अमेरिका में खड़ी हो रही सोलर इंडस्ट्री को नुकसान ना हो। हाल ही चीन की शिकायत पर डब्ल्यूटीओ ने एक पैनल का गठन किया है। जो भारत के ऑटोमोटिव और ग्रीन एनर्जी सैक्टर को मिल रहे सरकारी सपोर्ट की जांच करेगा। चीन की शिकायत है कि इन स्कीम्स के तहत मेड इन इंडिया प्रोडक्ट्स की शर्त है जिससे इंपोर्टेड (चीन में बने) प्रोडक्ट्स को नुकसान होता है। भारत सरकार जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग के शेयर को बढ़ाकर 25 परसेंट तक पहुंचाने का टार्गेट लेकर चल रही है। लेकिन अमेरिका और चीन जैसे दो सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स की इन आपत्तियों के कारण नए चैलेंज खड़े हो सकते हैं। हालांकि अमेरिका और चीन की सब्सिडी पॉलिसी की भी जांच चल रही है। चीन ने अमेरिका के 2022 में आए मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम (इंफ्लेशन रिडक्शन एक्ट) के कुछ पहलुओं को चैलेंज किया है। चीन का तर्क है कि कुछ सब्सिडी में सीधे-सीधे लोकल इनपुट की शर्त है। इसी तरह यूरोपीय देशों ने चीन पर अपने इलेक्ट्रिक वेहीकल्स और सोलर सैक्टर को ग्लोबल स्केल पर खड़ा करने के लिए बड़े पैमाने पर सब्सिडी दी है।

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मेक इन इंडिया में अमेरिका और चीन ने लगाया अडंगा

दुनिया की टॉप 2 इकोनॉमी अमेरिका और चीन ने इंडिया के मेक इन इंडिया मिशन को पटरी से उतारने के लिए कमर कस ली है। भारत 2030 तक दुनिया की तीसरी बड़ी इकोनॉमी बन जाएगा। अमेरिका और चीन का तर्क है कि भारत गलत तरीके से सब्सिडी देकर इंटरनेशनल ट्रेड के नियमों का उल्लंघन कर रहा है। अमेरिका और चीन दोनों को ही प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (पीएलआई) खटक रही है। मोदी सरकार ने कोविड के दौर में लोकल मैन्युफैक्चरिंग को प्रमोट और सपोर्ट करने के लिए पीएलआई स्कीम शुरू की थी। पीएलआई स्कीम में इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स से लेकर सोलर इक्विपमेंट और मेडिकल डिवाइस तक 14 इंडस्ट्री को कवर करते हुए 1.91 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इन दोनों देशों की शिकायत यह है कि इस तरह की इंसेंटिव स्कीम से इंडिया इंक को प्राइस कंपीटिशन में विदेशी कंपनियों के खिलाफ नाजायज एडवांटेज मिलता है। सोलर इंडस्ट्री में वारी एनर्जी•ा, अडानी एंटरप्राइजेज और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी फम्र्स को पीएलआई के साथ ही तरह-तरह की नॉन टैरिफ सरकारी सुविधाओं से फायदा हुआ है। आप जानते हैं अमेरिका ने फरवरी में मेड इन इंडिया सोलर सैल और मॉड्यूल पर 126' सीवीडी (काउंटरवेलिंग ड्यूटी) लगा दी थी। काउंटरवेलिंग ड्यूटी दरअसल किसी सरकार (जैसे भारत) द्वारा दी जा रही सब्सिडी के एडवांटेज को खत्म करने के लिए लगाई जाती है। अमेरिका का कहना है कि भारत की सोलर इंडस्ट्री को सरकारी सपोर्ट के कारण कॉस्ट एडवांटेज मिल रहा है। एनेलिस्ट कहते हैं कि अमेरिका इस सीवीडी के जरिए भारत में बने सोलर सैल और मॉड्यूल्स को प्राइस आउट (महंगा) करना चाहता है ताकि अमेरिका में खड़ी हो रही सोलर इंडस्ट्री को नुकसान ना हो। हाल ही चीन की शिकायत पर डब्ल्यूटीओ ने एक पैनल का गठन किया है। जो भारत के ऑटोमोटिव और ग्रीन एनर्जी सैक्टर को मिल रहे सरकारी सपोर्ट की जांच करेगा। चीन की शिकायत है कि इन स्कीम्स के तहत मेड इन इंडिया प्रोडक्ट्स की शर्त है जिससे इंपोर्टेड (चीन में बने) प्रोडक्ट्स को नुकसान होता है। भारत सरकार जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग के शेयर को बढ़ाकर 25 परसेंट तक पहुंचाने का टार्गेट लेकर चल रही है। लेकिन अमेरिका और चीन जैसे दो सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स की इन आपत्तियों के कारण नए चैलेंज खड़े हो सकते हैं। हालांकि अमेरिका और चीन की सब्सिडी पॉलिसी की भी जांच चल रही है। चीन ने अमेरिका के 2022 में आए मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम (इंफ्लेशन रिडक्शन एक्ट) के कुछ पहलुओं को चैलेंज किया है। चीन का तर्क है कि कुछ सब्सिडी में सीधे-सीधे लोकल इनपुट की शर्त है। इसी तरह यूरोपीय देशों ने चीन पर अपने इलेक्ट्रिक वेहीकल्स और सोलर सैक्टर को ग्लोबल स्केल पर खड़ा करने के लिए बड़े पैमाने पर सब्सिडी दी है।


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