1960 से 2026 तक: पूरे 60 साल का सफर। दुनिया बदल गई, अर्थव्यवस्थाएं बदल गईं, तकनीक बदल गई, लेकिन एक आंकड़ा ऐसा है जिसने भारत की विकास यात्रा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। डेटा के मुताबिक, 1960 में भारत की Per Capita Income (प्रति व्यक्ति आय) दुनिया की उस समय की एवरेज Per Capita Income का करीब 18.7 प्रतिशत थी और 2026 में भी यह लगभग 20 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान है। यानी छह दशक बीत गए, लेकिन दुनिया के मुकाबले भारत की स्थिति लगभग वहीं की वहीं है। बीच के वर्षों में तस्वीर और भी चिंताजनक रही। 1993 तक भारत की Per Capita Income दुनिया की औसत Per Capita Income के मुकाबले गिरकर सिर्फ 6.5 प्रतिशत रह गई थी। इसका मतलब था कि दुनिया आगे निकलती गई और भारत लंबे समय तक धीमी रफ्तार में फंसा रहा। आर्थिक बंदिशें, कम प्रोडक्टिविटी, कमजोर इंडस्ट्रीयल डवलपमेंट और सीमित वैश्विक भागीदारी ने भारत की आमदनी की गति को रोक दिया। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने वापसी जरूर की। टेक्नोलॉजी, सर्विस सेक्टर, डिजिटल इकोनॉमी और बढ़ते इंवेस्टमेंट ने देश को नई ऊर्जा दी। करोड़ों लोग गरीबी से बाहर आए, शहरों का विस्तार हुआ और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है - अगर भारत इतनी तेजी से बढ़ा, तो फिर भारतीय नागरिक की औसत Capita Income दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा क्यों नहीं बढ़ी? इसका जवाब भारत की विशाल आबादी, इनकम असमानता और लंबे समय तक धीमी Per Capita Income ग्रोथ में छिपा है। देश की कुल अर्थव्यवस्था जरूर बड़ी हुई, लेकिन प्रति व्यक्ति स्तर पर भारत अब भी वैश्विक औसत से काफी पीछे है। आज भी अनुमान है कि 2026 में भारत की Per Capita Income करीब 3,050 डॉलर होगी, जबकि दुनिया की एवरेज Per Capita Income लगभग 15,280 डॉलर रहेगी। यानी भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था तो बन गया, लेकिन आम भारतीय की वैश्विक Capita Income के मुकाबले स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया। यही भारत की विकास कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास है। अब असली चुनौती सिर्फ अर्थव्यवस्था को बड़ा बनाना नहीं, बल्कि हर भारतीय की इनकम को तेजी से बढ़ाना है क्योंकि जब तक आम नागरिक की कमाई दुनिया की रफ्तार से आगे नहीं बढ़ेगी, तब तक ‘विकसित भारत’ का सपना अधूरा ही रहेगा।
