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07-05-2026

इंडियन साइंटिस्ट ने बनाया 3डी मिनी-ब्रेन

  •  बायोलॉजी और मशीन के बीच की धारी को धुंधला करते हुए, भारतीय मूल के साइंटिस्ट डॉ. कुमार मृत्युंजय की टीम ने एक ऐसा 3डी मिनी-ब्रेन सिस्टम डवलप किया है जो जीवित न्यूरॉन्स को इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ बहुत क्रांतिकारी तरीके कनेक्ट कर सकता है। रिसर्च जर्नल नेचर इलेक्ट्रॉनिक्स की रिपोर्ट के अनुसार इसे बुद्धिमत्ता, सीखने और मस्तिष्क के व्यवहार को समझने में एक बड़ी छलांग माना जा रहा है। डॉ. मृत्युंजय ने आईआईटी खडग़पुर से बीटेक और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और न्यूरोसाइंस में ड्यूल पीएचडी पूरी की। इस डिवाइस में जीवित मस्तिष्क कोशिकाएं एक 3डी इलेक्ट्रॉनिक फ्रेमवर्क के भीतर बढ़ती और आपस में संवाद करती हैं। पहले के ब्रेन-ऑन-चिप मॉडल ज्यादातर फ्लैट (2डी) होते थे, लेकिन यह नया प्लेटफॉर्म न्यूरॉन्स को हर दिशा में बढऩे देता है, जिससे यह मानव मस्तिष्क की कुदरती संरचना के ज्यादा करीब हो जाता है। इसमें लगे सूक्ष्म सेंसर न केवल न्यूरॉन्स के इलेक्ट्रिकल सिग्नल रिकॉर्ड करते हैं, बल्कि उन्हें स्टिमुलेट (उत्तेजित करना या भडक़ाना) भी कर सकते हैं—यानी मशीन और जीवित ऊतक के बीच दो-तरफा संवाद संभव है। इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि यह महीनों तक स्थिर न्यूरल गतिविधि बनाए रख सकता है। इससे वैज्ञानिक यह समझ सकते हैं कि समय के साथ न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन कैसे मजबूत या कमजोर होते हैं और इसी आधार पर सीखने और याददाश्त की प्रोसेसिंग होती है। इसके अलावा, यह डिवाइस प्रोग्रामेबल भी है, यानी न्यूरल नेटवर्क किस तरह का व्यवहार करेंगे यह वैज्ञानिक कंट्रोल कर सकते हैं। इसका मतलब है कि अब जैविक सिस्टम (बायोलॉजिकल सिस्टम) को भी एआई की तरह ट्रेन किया जा सकता है। एआई को डिजिटल एल्गोरिद्म से ट्रेन किया जाता है जबकि इस मिनी ब्रेन को असली न्यूरॉन्स से ट्रेन किया जा सकेगा। इससे न्यूरोलॉजिकल बीमारियों पर रिसर्च तेज हो सकती है, ब्रेन-मशीन इंटरफेस बेहतर हो सकते हैं और ऐसे नए कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित हो सकते हैं जिनमें बायोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक्स साथ मिलकर काम करते हों।

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इंडियन साइंटिस्ट ने बनाया 3डी मिनी-ब्रेन

 बायोलॉजी और मशीन के बीच की धारी को धुंधला करते हुए, भारतीय मूल के साइंटिस्ट डॉ. कुमार मृत्युंजय की टीम ने एक ऐसा 3डी मिनी-ब्रेन सिस्टम डवलप किया है जो जीवित न्यूरॉन्स को इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ बहुत क्रांतिकारी तरीके कनेक्ट कर सकता है। रिसर्च जर्नल नेचर इलेक्ट्रॉनिक्स की रिपोर्ट के अनुसार इसे बुद्धिमत्ता, सीखने और मस्तिष्क के व्यवहार को समझने में एक बड़ी छलांग माना जा रहा है। डॉ. मृत्युंजय ने आईआईटी खडग़पुर से बीटेक और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और न्यूरोसाइंस में ड्यूल पीएचडी पूरी की। इस डिवाइस में जीवित मस्तिष्क कोशिकाएं एक 3डी इलेक्ट्रॉनिक फ्रेमवर्क के भीतर बढ़ती और आपस में संवाद करती हैं। पहले के ब्रेन-ऑन-चिप मॉडल ज्यादातर फ्लैट (2डी) होते थे, लेकिन यह नया प्लेटफॉर्म न्यूरॉन्स को हर दिशा में बढऩे देता है, जिससे यह मानव मस्तिष्क की कुदरती संरचना के ज्यादा करीब हो जाता है। इसमें लगे सूक्ष्म सेंसर न केवल न्यूरॉन्स के इलेक्ट्रिकल सिग्नल रिकॉर्ड करते हैं, बल्कि उन्हें स्टिमुलेट (उत्तेजित करना या भडक़ाना) भी कर सकते हैं—यानी मशीन और जीवित ऊतक के बीच दो-तरफा संवाद संभव है। इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि यह महीनों तक स्थिर न्यूरल गतिविधि बनाए रख सकता है। इससे वैज्ञानिक यह समझ सकते हैं कि समय के साथ न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन कैसे मजबूत या कमजोर होते हैं और इसी आधार पर सीखने और याददाश्त की प्रोसेसिंग होती है। इसके अलावा, यह डिवाइस प्रोग्रामेबल भी है, यानी न्यूरल नेटवर्क किस तरह का व्यवहार करेंगे यह वैज्ञानिक कंट्रोल कर सकते हैं। इसका मतलब है कि अब जैविक सिस्टम (बायोलॉजिकल सिस्टम) को भी एआई की तरह ट्रेन किया जा सकता है। एआई को डिजिटल एल्गोरिद्म से ट्रेन किया जाता है जबकि इस मिनी ब्रेन को असली न्यूरॉन्स से ट्रेन किया जा सकेगा। इससे न्यूरोलॉजिकल बीमारियों पर रिसर्च तेज हो सकती है, ब्रेन-मशीन इंटरफेस बेहतर हो सकते हैं और ऐसे नए कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित हो सकते हैं जिनमें बायोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक्स साथ मिलकर काम करते हों।


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