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06-05-2026

‘रेवड़ी’ से चल रही ‘घर की रोटी’!

  •  तमिलनाडु में तूफान बनकर छाए थलपथी विजय ने गरीब बेटियों को शादी में 8 ग्राम गोल्ड और सिल्क साड़ी देने का वायदा किया है। गरीब बुजुर्ग महिलाओं को हर महिने 2500 रुपये, साल में 6 एलपीजी सिलिंडर (करीब 6 हजार रुपये के) भी देंगे। पश्चिम बंगाल में लक्खी भंडार सहित 20 से भी ज्यादा महिला केंद्रित योजनाओं के दम पर ममता बनर्जी 15 साल तक सरकार चला गईं। बीजेपी ने बिटर पिल (कड़वी गोली) निगलते हुए महिलाओं को हर महीने 3 हजार रुपये देने का वायदा किया है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकारें जो रेवड़ी बांट रही हैं वो गरीब परिवारों के लिए रोटी साबित हो रही हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार ये स्कीम्स भले ही अमीरी-गरीबी की खाई नहीं पाट सकती हैं लेकिन गरीब परिवारों में उपभोग को बढ़ावा दे रही हैं। आपको याद होगा वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारी प्रेशर के बावजूद किसानों को कैश ट्रांसफर करने से मना कर दिया था। लेकिन आखिर झुकना पड़ा और किसान सम्मान निधि आज मोदी सरकार के फ्लेगशिप प्रोग्राम में शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में देश में केवल 4 राज्य ही कैश ट्रांसफर या कहें तो रेवड़ी बांट रहे थे लेकिन आज 17 राज्यों में इस तरह की कैश ट्रांसफर स्कीम  चल रही हैं। इसका सीधा अर्थ है कि कैश ट्रांसफर अब व्यापक पॉलिसी टूल बन चुका है। आमतौर पर इनके दायरे में महिलाएं, किसान और निम्न-आय वर्ग के लोगों को शामिल किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग औसत 1,500 रुपये महीने कैश ट्रांसफर गरीब परिवारों के लिए बड़ी मदद साबित हो रहा है। एनएसओ के 2023-24 के उपभोग सर्वे (॥ष्टश्वस्) अनुसार सबसे गरीब 20 परसेंट परिवारों का इस रकम से 74 परसेंट और शहरी गरीबों का 51 परसेंट खर्च निकल जाता है। चूंकि कैश ट्रांसफर हर महीने मिलते है इससे यह गरीब परिवारों फिक्स इनकम या स्टेबल इनकम का सा सपोर्ट करते हैं। यदि किसी परिवार में महिला, बुजुर्ग माता-पिता, एक बेटी और एक किसान हो तो महीने में कुल रकम 8-10 हजार रुपये तक हो सकती है। इसके साथ ही 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन और मनरेगा (वीबी-जीराम-जी) जैसी योजनाएं भी गरीब परिवार को इनकम पिरामिड में ऊपर उठाने में मदद कर सकती है। यदि कोविड, मौसमी मार से फसल खराबा जैसे हालात हों तो इन योजनाओं के दम पर गरीबों को एक सेफ्टी कुशन मिल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल (डीबीटी) ट्रांसफर होने के कारण इनमें लीकेज अमूमन रुक चुका है और सीधे लाभार्थी को इसका फायदा मिल रहा है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की योजनाओं के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव सकारात्मक रहे हैं लेकिन वित्त वर्ष 2026 में राज्यों की कुल मार्केट बॉरोइंग 15.2 परसेंट बढक़र 12.4 लाख करोड़ हो गई। साथ ही कई राज्य सरकारें कैपेक्स (पूंजीगत निवेश) को नजरअंदाज कर इस तरह की लोकलुभावन योजनाओं पर ज्यादा खर्च कर रही हैं। इकोनॉमिस्ट इस तरह के कैश ट्रांसफर को डिमांड स्टेबलाइजर यानी कंज्यूमर डिमांड को स्थिर करने का टूल भी मानते हैं क्योंकि निम्न-आय वर्ग के लोग अतिरिक्त इनकम का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं, इसलिए इन कैश ट्रांसफर का मल्टीप्लायर इफेक्ट ज्यादा होता है और ये इकोनॉमी को स्टेबल रखने में भी मददगार होते हैं।

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‘रेवड़ी’ से चल रही ‘घर की रोटी’!

 तमिलनाडु में तूफान बनकर छाए थलपथी विजय ने गरीब बेटियों को शादी में 8 ग्राम गोल्ड और सिल्क साड़ी देने का वायदा किया है। गरीब बुजुर्ग महिलाओं को हर महिने 2500 रुपये, साल में 6 एलपीजी सिलिंडर (करीब 6 हजार रुपये के) भी देंगे। पश्चिम बंगाल में लक्खी भंडार सहित 20 से भी ज्यादा महिला केंद्रित योजनाओं के दम पर ममता बनर्जी 15 साल तक सरकार चला गईं। बीजेपी ने बिटर पिल (कड़वी गोली) निगलते हुए महिलाओं को हर महीने 3 हजार रुपये देने का वायदा किया है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकारें जो रेवड़ी बांट रही हैं वो गरीब परिवारों के लिए रोटी साबित हो रही हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार ये स्कीम्स भले ही अमीरी-गरीबी की खाई नहीं पाट सकती हैं लेकिन गरीब परिवारों में उपभोग को बढ़ावा दे रही हैं। आपको याद होगा वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारी प्रेशर के बावजूद किसानों को कैश ट्रांसफर करने से मना कर दिया था। लेकिन आखिर झुकना पड़ा और किसान सम्मान निधि आज मोदी सरकार के फ्लेगशिप प्रोग्राम में शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में देश में केवल 4 राज्य ही कैश ट्रांसफर या कहें तो रेवड़ी बांट रहे थे लेकिन आज 17 राज्यों में इस तरह की कैश ट्रांसफर स्कीम  चल रही हैं। इसका सीधा अर्थ है कि कैश ट्रांसफर अब व्यापक पॉलिसी टूल बन चुका है। आमतौर पर इनके दायरे में महिलाएं, किसान और निम्न-आय वर्ग के लोगों को शामिल किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग औसत 1,500 रुपये महीने कैश ट्रांसफर गरीब परिवारों के लिए बड़ी मदद साबित हो रहा है। एनएसओ के 2023-24 के उपभोग सर्वे (॥ष्टश्वस्) अनुसार सबसे गरीब 20 परसेंट परिवारों का इस रकम से 74 परसेंट और शहरी गरीबों का 51 परसेंट खर्च निकल जाता है। चूंकि कैश ट्रांसफर हर महीने मिलते है इससे यह गरीब परिवारों फिक्स इनकम या स्टेबल इनकम का सा सपोर्ट करते हैं। यदि किसी परिवार में महिला, बुजुर्ग माता-पिता, एक बेटी और एक किसान हो तो महीने में कुल रकम 8-10 हजार रुपये तक हो सकती है। इसके साथ ही 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन और मनरेगा (वीबी-जीराम-जी) जैसी योजनाएं भी गरीब परिवार को इनकम पिरामिड में ऊपर उठाने में मदद कर सकती है। यदि कोविड, मौसमी मार से फसल खराबा जैसे हालात हों तो इन योजनाओं के दम पर गरीबों को एक सेफ्टी कुशन मिल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल (डीबीटी) ट्रांसफर होने के कारण इनमें लीकेज अमूमन रुक चुका है और सीधे लाभार्थी को इसका फायदा मिल रहा है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की योजनाओं के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव सकारात्मक रहे हैं लेकिन वित्त वर्ष 2026 में राज्यों की कुल मार्केट बॉरोइंग 15.2 परसेंट बढक़र 12.4 लाख करोड़ हो गई। साथ ही कई राज्य सरकारें कैपेक्स (पूंजीगत निवेश) को नजरअंदाज कर इस तरह की लोकलुभावन योजनाओं पर ज्यादा खर्च कर रही हैं। इकोनॉमिस्ट इस तरह के कैश ट्रांसफर को डिमांड स्टेबलाइजर यानी कंज्यूमर डिमांड को स्थिर करने का टूल भी मानते हैं क्योंकि निम्न-आय वर्ग के लोग अतिरिक्त इनकम का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं, इसलिए इन कैश ट्रांसफर का मल्टीप्लायर इफेक्ट ज्यादा होता है और ये इकोनॉमी को स्टेबल रखने में भी मददगार होते हैं।


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