भारत में मार्च तिमाही के दौरान पहली बार ज्यूलरी के लिए गोल्ड की डिमांड इंवेस्टमेंट डिमांड से पिछड़ गई। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, कमजोर इक्विटी मार्केट रिटर्न और जियो-पॉलिटिक्स में बढ़ती अनिश्चितता के बीच इंवेस्टर ने सेफ हेवन के रूप में गोल्ड पर भयंकर भरोसा जताया जिससे गोल्ड की इंवेस्टमेंट डिमांड में भारी तेजी दर्ज की गई। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े गोल्ड कंज्यूमर भारत में इस मजबूत इंवेस्टमेंट डिमांड के कारण ज्यूलरी गोल्ड की घटती डिमांड से हो रहे घाटे की भरपाई करने में मदद मिली है। गोल्ड प्राइस में तेज बढ़ोतरी के कारण गोल्ड ज्यूलरी की ज्यादातर डिमांड रिसाइकल कैटेगरी में है फ्रेश गोल्ड का शेयर बहुत तेजी से घटा है। हालांकि ज्यूलरी गोल्ड की डिमांड घटने से हो रहे घाटे की भरपाई इंवेस्टमेंट गोल्ड से हो जाने के कारण नेट कंजम्पशन पॉजिटिव रहा। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के सचिन जैन ने कहा कि चालू वर्ष की जनवरी-मार्च की तिमाही ऐसी रही जिसमें पहली बार इंवेस्टमेंट डिमांड ज्यूलरी की डिमांड से आगे निकल गई है। जैन के अनुसार फाइनेंशियल और रिटेल इंवेस्टरों की गोल्ड में दिलचस्पी बढऩे के कारण आने वाले समय में यह ट्रेंड और ग्राउंड गेन (मजबूत होना) कर सकता है। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार मार्च तिमाही में इंवेस्टमेंट डिमांड सालाना आधार पर 52 परसेंट बढक़र 82 मीट्रिक टन हो गई, जबकि ज्यूलरी के लिए गोल्ड की डिमांड 19.5 परसेंट गिरकर 66 टन रह गई। इसके बावजूद कुल गोल्ड कंजम्पशन 10.2 परसेंट बढक़र 151 टन तक पहुंच गया, जिससे पता चलता है कि गोल्ड की डिमांड अब इंवेस्टमेंट लैड है। नवरी-मार्च तिमाही में गोल्ड के कुल कंजम्पशन में इंवेस्टमेंट का शेयर 54.3 परसेंट रहा, जो पहली बार ज्यूलरी से अधिक है, और यह आम तौर पर यह हिस्सा लगभग एक-चौथाई ही होता है।गोल्ड प्राइस के रॉकेट हो जाने के कारण इंवेस्टर ज्यूलरी के बजाय कॉइन्स, बार (छड़) और गोल्ड ईटीएफ जैसे वित्तीय विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। गोल्ड ईटीएफ में इंवेस्टमेंट 186 परसेंट बढक़र रिकॉर्ड 20 टन तक पहुंच गया। शेयर मार्केट के कमजोर प्रदर्शन ने भी गोल्ड में इंवेस्टमेंट के इस ट्रेंड को हवा दी। वर्ष 2025 की शुरुआत से जहां गोल्ड प्राइस करीब दोगुनी हो गईं वहीं निफ्टी 50 में केवल 2.4 परसेंट की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एनेलिस्ट्स का मानना है कि जब तक शेयर बाजार में रिटर्न सीमित रहता है और ग्लोबल ऑर्डर में उठा-पटक शांत नहीं होती है तब तक भारत में गोल्ड में इंवेस्टमेंट की डिमांड में मजबूत बनी रह सकती है। इसे भारत के परंपरागत ज्यूलरी आधारित गोल्ड मार्केट के लिहाज से एक बड़ा स्ट्रक्चरल शिफ्ट कहा जा सकता है।
