वस्त्र नगरी के टेक्सटाइल मार्केट का संकट अभी हल होते दिखाई नहीं देता है। घरेलू बाजार में उठाव दिखाई नहीं दे रहा है, वहीं अमेरिका, इजराइल -ईरान युद्ध के चलते यहां का एक्सपोर्ट मार्केट भी डिस्टर्ब है। टेक्सटाइल की खपत के दोनों मोर्चों पर कमजोरी के कारण मार्केट अपने सबसे कठिन संकट के दौर से गुजर रहा है। कठिन हालात से बाहर निकालने के लिए टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़े सभी संगठनों ने सरकार से विशेष पैकेज की मांग की है। इसके लिए वित्तीय छूट के साथ कैश संकट से उद्योगों को बाहर निकालने के लिए वर्किंग केपीटल के पैकेज की मांग की गई है।भीलवाड़ा के कई टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स का प्रति माह करोड़ों रुपयों का कपड़ा एक्सपोर्ट होता है, लेकिन युद्ध के चलते तैयार कपड़ा शिपिंग में फंसा हुआ है। ट्रांजिट में होने से पैसा अटक गया है। दूसरी ओर लम्बे समय से घरेलू बाजार के नहीं चलने से टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स के गोदामों में करोड़ों मीटर तैयार कपड़ा के स्टॉक पड़ा ह़आ है। टेक्सटाइल सेक्टर में धागें में तेजी के चलते एक उम्मीद दिखाई देने लगी थी, कि धागा तेज होने से पुरानी दरों पर खरीदे गये धागे से बने कपड़े के अच्छे दाम मिल जाएंगें, लेकिन घरेलू बाजार में मांग नहीं होने से कपड़ा उत्पादको ने अपने स्टॉक को कम करने के लिए पुरानी दरों पर कपड़ा विक्रय करना पड़ा। इससे लम्बे समय से गोदामों में जमा पुराने स्टॉक से राहत मिली है। युद्ध के चलते ऑयल पर आधारित सभी वस्तुओं के दाम बढऩे, डाइज केमिकल के भावों में तेजी के कारण कपड़े की कास्ट बढ़ गई, लेकिन इन मूल्यों पर बाजार से सपोर्ट नहीं मिलने ओर निर्यात बाजार में मांग नहीं होने से पहली बार भीलवाड़ा के टेक्सटाइल मार्केट में अप्रेल-मई माह जैसी ग्राहकी नहीं है। आने वाले दिनों में कोई बड़ा फेस्टीवल और स्कूल यूनिफॉर्म की मांग भी नहीं होने से बाजार पर संकट के हालात बने हुए है। युद्ध समाप्त होने की सम्भावनाएं दिखाई दे रही है उसके बाद एक्सपोर्ट मार्केट में सुधार आने की उम्मीद दिखाई दे रही है। टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स भी अपनी मांग को ध्यान में रखते हुए कपड़ा उत्पादन का प्रोग्राम बनाने से गत माह की तुलना में अप्रेल में उत्पादन प्रति माह आठ करोड़ से घट कर कम हुआ है।