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09-04-2026

आरबीआई ने रेपो रेट को यथावत रखा, 2026-27 में वृद्धि दर 6.9% रहने का अनुमान

  •  भारतीय रिजर्व बैंक ने वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितता के बीच महंगाई बढऩे के जोखिम को देखते हुए बुधवार को नीतिगत दर रेपो को उम्मीद के मुताबिक 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा। आरबीआई ने इसके साथ सतर्कता बरतते हुए ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति का रुख अपनाया है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में लगभग 40 दिन चले युद्ध के कारण कच्चे तेल दाम में उल्लेखनीय तेजी आई है। इससे ईंधन के आयात पर निर्भर भारत जैसे देशों के लिए मुद्रास्फीतिक दबाव बढ़ा है। हालांकि, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध विराम से वैश्विक स्तर पर पुनरुद्धार की उम्मीद भी बंधी है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने छह-सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की छह अप्रैल से शुरू तीन-दिवसीय बैठक में लिए गए इन निर्णयों की जानकारी देते हुए कहा, ‘‘एमपीसी ने आम सहमति से रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का निर्णय किया है।’’ उन्होंने कहा कि इसके साथ ही एमपीसी ने मौद्रिक नीति के मामले में ‘तटस्थ’ रुख को बनाये रखा है। इसका मतलब है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक स्थिति के हिसाब से नीतिगत दर में समायोजन को लेकर लचीला बना रहेगा। रेपो वह ब्याज दर है, जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिये केंद्रीय बैंक से कर्ज लेते हैं। आरबीआई के रेपो दर को यथावत रखने के फैसले से आवास, वाहन और वाणिज्यिक कर्ज की मासिक किस्त जस-की-तस बने रहने की संभावना है। सरकार की पिछले महीने आरबीआई के लिए नए मुद्रास्फीति लक्ष्य की घोषणा के बाद यह पहली मौद्रिक नीति समीक्षा है। सरकार ने आरबीआई को मार्च, 2031 तक अगले पांच वर्षों के लिए खुदरा मुद्रास्फीति को दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है। मल्होत्रा ने एमपीसी के नीतिगत दर को यथावत रखने के निर्णय के कारणों का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘पिछली नीतिगत बैठक के बाद से, वैश्विक अनिश्चितताएं काफी बढ़ गई हैं। हालांकि, कुल (हेडलाइन) मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और लक्ष्य से नीचे है, लेकिन ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि के दबाव और खाद्य कीमतों को प्रभावित करने वाली संभावित मौसम संबंधी गड़बडय़िों के कारण मुद्रास्फीति के दृष्टिकोण के लिए जोखिम बढ़ गए हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति का दबाव कम बना हुआ है, हालांकि आपूर्ति श्रृंखला में समस्याओं को देखते हुए आने वाले समय में महंगाई की दिशा को लेकर अनिश्चितता है। फरवरी में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 3.21 प्रतिशत रही जो आरबीआई को दिये गये चार प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास है। इसके साथ ही अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले रुपया पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद से चार प्रतिशत से अधिक टूटा है। इससे आयातित मुद्रास्फीति बढऩे का जोखिम है। 

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आरबीआई ने रेपो रेट को यथावत रखा, 2026-27 में वृद्धि दर 6.9% रहने का अनुमान

 भारतीय रिजर्व बैंक ने वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितता के बीच महंगाई बढऩे के जोखिम को देखते हुए बुधवार को नीतिगत दर रेपो को उम्मीद के मुताबिक 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा। आरबीआई ने इसके साथ सतर्कता बरतते हुए ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति का रुख अपनाया है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में लगभग 40 दिन चले युद्ध के कारण कच्चे तेल दाम में उल्लेखनीय तेजी आई है। इससे ईंधन के आयात पर निर्भर भारत जैसे देशों के लिए मुद्रास्फीतिक दबाव बढ़ा है। हालांकि, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध विराम से वैश्विक स्तर पर पुनरुद्धार की उम्मीद भी बंधी है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने छह-सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की छह अप्रैल से शुरू तीन-दिवसीय बैठक में लिए गए इन निर्णयों की जानकारी देते हुए कहा, ‘‘एमपीसी ने आम सहमति से रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का निर्णय किया है।’’ उन्होंने कहा कि इसके साथ ही एमपीसी ने मौद्रिक नीति के मामले में ‘तटस्थ’ रुख को बनाये रखा है। इसका मतलब है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक स्थिति के हिसाब से नीतिगत दर में समायोजन को लेकर लचीला बना रहेगा। रेपो वह ब्याज दर है, जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिये केंद्रीय बैंक से कर्ज लेते हैं। आरबीआई के रेपो दर को यथावत रखने के फैसले से आवास, वाहन और वाणिज्यिक कर्ज की मासिक किस्त जस-की-तस बने रहने की संभावना है। सरकार की पिछले महीने आरबीआई के लिए नए मुद्रास्फीति लक्ष्य की घोषणा के बाद यह पहली मौद्रिक नीति समीक्षा है। सरकार ने आरबीआई को मार्च, 2031 तक अगले पांच वर्षों के लिए खुदरा मुद्रास्फीति को दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है। मल्होत्रा ने एमपीसी के नीतिगत दर को यथावत रखने के निर्णय के कारणों का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘पिछली नीतिगत बैठक के बाद से, वैश्विक अनिश्चितताएं काफी बढ़ गई हैं। हालांकि, कुल (हेडलाइन) मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और लक्ष्य से नीचे है, लेकिन ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि के दबाव और खाद्य कीमतों को प्रभावित करने वाली संभावित मौसम संबंधी गड़बडय़िों के कारण मुद्रास्फीति के दृष्टिकोण के लिए जोखिम बढ़ गए हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति का दबाव कम बना हुआ है, हालांकि आपूर्ति श्रृंखला में समस्याओं को देखते हुए आने वाले समय में महंगाई की दिशा को लेकर अनिश्चितता है। फरवरी में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 3.21 प्रतिशत रही जो आरबीआई को दिये गये चार प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास है। इसके साथ ही अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले रुपया पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद से चार प्रतिशत से अधिक टूटा है। इससे आयातित मुद्रास्फीति बढऩे का जोखिम है। 


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