भारतीय संस्कृति में दान और दक्षिणा को अत्यंत पवित्र कर्म माना गया है। दान और दया दोनों ही मनुष्य के भीतर करुणा, कृतज्ञता, विनम्रता और धर्मबुद्धि को जाग़त करने के साधन है।ज्ञातव्य है कि हिंदु धर्म ग्रंथों यदा, वेद, पुराण, महाभारत, रामायण व स्मृतियों में दान-दक्षिणा का विस्तृत वर्णन मिलता है। दान शब्द संस्कृत की ‘दा’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है- देना, अर्थात देने की क्रिया ही दान है। जब कोई व्यक्ति बिना प्रत्यक्ष-स्वार्थ के दूसरों के कल्याण के लिये अपनी कोई वस्तु, अन्न, धन, भूमि, विद्या आदि अर्पण करता है तो उसे दान कहते हैं। उल्लेखनीय है कि दान करने के पीछे पुण्य की भावना अवश्य होती है, जिसे अप्रत्यक्ष स्वार्थ की संज्ञा दी जा सकती है। अपनी चल और अचल सम्पत्ति का एक उचित भाग समाज कल्याण में बांटना दान कहलाता है।