गीता के श्लोक16/1 के अनुसार दान को देवी-सम्पदा का लक्षण माना गया है। दान के बारे में गीता के श्लोक 17/20 में कहा है-
दातव्य मिति यदानं दीयतेडनुपकारिजे।
देशे काले च पात्रे चतद्दानंसात्विकं स्मृतम्।।
अर्थात जो दान बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के, योग्य पात्र को उचित समय और स्थान पर दिया जाये, वह सात्विक दान कहलाता है।
दान श्रद्धापूर्वक देना चाहिये, अपने ऐश्वर्य के अनुसार देना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो द्रव्य दान स्वरूप कत्र्तव्य मानकर देता है, उसे किसी पर उपकार न करते हुए निष्काम भाव से ही देना चाहिये अर्थात दान देकर कुछ पाने की आशा नहीं करनी चाहिये। दान देते समय देश, काल या पात्र का भी ध्यान रखना चाहिये। यहां देश से तात्पर्य उचित स्थान से है जैसे- तीर्थ स्थानों में विश्राम गृह बनवाने में, असहायों की सहायतार्थ दान देना चाहिये। पात्र से आशय है कि दान ग्रहण करने वाला, दान पाने का पत्र (जैस अपंग, असहाय, रोगी, निर्धन, बेसहारा, आश्रित होना चाहिये।)