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20-05-2026

‘अपने भीतर को सुन्दर बनायें’

  •  आहार- आहार उत्तेजक मादक एवं भारी नहीं होना चाहिये। शरीर को बोझिल नहीं बनाना है। भोजन एवं प्रार्थना पूर्ण कृत्य बनें। भोजन किस भाव दशा से करते हैं, भावदशा आनंदपूर्ण होनी चाहिये। मन- अनुग्रह से भरा हो, कृतज्ञता से भरें। आभार व्यक्त करें। नाभि- यह विल पावर का केन्द्र है। रात्री में ध्यान करते-करते निद्रा में जायें। सुबह की यात्रा ध्यान करते-करते प्रारम्भ करें। आत्म पलायन न करें। गुड लिसनर बनें। विचार मुक्त होते चले जायेंगे। विचार जाल से मुक्त हों। विचार शून्य होने पर केवल विवेह रह जाता है। वर्तमान में हमारा जीवन गुनगुने पानी के समान है। कैसे करेंगे- श्वास के साथ प्रयोग करेंगे। आज से ही अपने आपको तैयार करें। मौन का सहारा लें। अनर्गल बातें/ अट्हास/ निंदा न करें। कम खाना खायें। एक्शन का रिएक्शन नहीं करें। स्वच्छ, सफेद वस्तों में, ढीले वस्त्रों में रहें। ध्यान के दौरान आंखें बंद रखें। मौन सतत रखें। ध्यान का प्राथमिक चरण अपनापन करेंगे अर्थात आती-जाती विशुद्ध सांस, अपनी सांस को महसूस करें। नासिका छिद्रों पर ध्यान लगायें/ गहरी सांस लें। तब विचारों का परिष्कार करेंगे। विचारों से लड़े नहीं। केवल साक्षी बनेंगे। दृष्टाभाव रखेंगे। शरीर को रिलेक्स करें। शिथिल करें। विवेक के साथ, मौनपूर्वक ध्यान करें। सकारात्मक भाव रखें। तब हम ध्यान के माध्यम से अपने भीतर को सुन्दर, निर्मल एवं आनंदित बना सकते हैं।

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‘अपने भीतर को सुन्दर बनायें’

 आहार- आहार उत्तेजक मादक एवं भारी नहीं होना चाहिये। शरीर को बोझिल नहीं बनाना है। भोजन एवं प्रार्थना पूर्ण कृत्य बनें। भोजन किस भाव दशा से करते हैं, भावदशा आनंदपूर्ण होनी चाहिये। मन- अनुग्रह से भरा हो, कृतज्ञता से भरें। आभार व्यक्त करें। नाभि- यह विल पावर का केन्द्र है। रात्री में ध्यान करते-करते निद्रा में जायें। सुबह की यात्रा ध्यान करते-करते प्रारम्भ करें। आत्म पलायन न करें। गुड लिसनर बनें। विचार मुक्त होते चले जायेंगे। विचार जाल से मुक्त हों। विचार शून्य होने पर केवल विवेह रह जाता है। वर्तमान में हमारा जीवन गुनगुने पानी के समान है। कैसे करेंगे- श्वास के साथ प्रयोग करेंगे। आज से ही अपने आपको तैयार करें। मौन का सहारा लें। अनर्गल बातें/ अट्हास/ निंदा न करें। कम खाना खायें। एक्शन का रिएक्शन नहीं करें। स्वच्छ, सफेद वस्तों में, ढीले वस्त्रों में रहें। ध्यान के दौरान आंखें बंद रखें। मौन सतत रखें। ध्यान का प्राथमिक चरण अपनापन करेंगे अर्थात आती-जाती विशुद्ध सांस, अपनी सांस को महसूस करें। नासिका छिद्रों पर ध्यान लगायें/ गहरी सांस लें। तब विचारों का परिष्कार करेंगे। विचारों से लड़े नहीं। केवल साक्षी बनेंगे। दृष्टाभाव रखेंगे। शरीर को रिलेक्स करें। शिथिल करें। विवेक के साथ, मौनपूर्वक ध्यान करें। सकारात्मक भाव रखें। तब हम ध्यान के माध्यम से अपने भीतर को सुन्दर, निर्मल एवं आनंदित बना सकते हैं।


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