परिश्रम शरीर की शक्ति है, जबकि पुरुषार्थ मन और बुद्धि की शक्ति है। हर पुरुषार्थ में परिश्रम होता है जबकि हर परिश्रम पुरुषार्थ नहीं होता। परिश्रम केवल कार्य करना नहीं है, बल्कि इसमें निम्न गुण यथा- निरंतरता, धैर्य, अनुशासन, सकारात्मक सोच आदि सम्मिलित हैं। कठिन परिश्रम और सच्ची लगन से असम्भव भी सम्भव बन जाता है, इसे निम्न कहानी से भी समझा जा सकता है- एक छोटे से गांव में एक खेतिहर निर्धन परिवार रहता था। परिवार में पति, पत्नी और उनका इकलौता पुत्र मनोहर था। परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं होने से मनोहर को अपने अध्ययन के अतिरिक्त अपने माता-पिता का कृषि कार्य में भी हाथ बंटाना पड़ता था। मनोहर के दृढ़ संकल्प ले रखा था, कि वह अपने कठिन परिश्रम से कुछ बड़ी उपलिब्ध हासिल करेगा। मनोहर प्रात: ब्रह्म मुहर्त में उठता, खेत में काम में हाथ बंटाता और फिर अध्ययन हेतु पाठशाला जाता। मन लगाकर पढ़ता, घर आकर भी खूब पढ़ाई करता। यहां तक कि रात्री में भी वह देर तक पढ़ता। सुबह बना आलस्य किये जल्दी उठता।