समय बीतता गया, परीक्षा निकट आ गयी, पर मनोहर डगमगाया नहीं बल्कि उसने घर के कार्य और पढ़ाई के कार्य में संतुलन बनाये रखा। उसकी नियमित एवं कठिन मेहनत रंग लाई और परीक्षा में उसने पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अपनी सफलता के कारण उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे। गांव के सभी वृद्ध, युवा उसको स्नेह से तथा बालक सम्मान की दृष्टि से देखते थे। स्कूल के सभी अध्यापकों को मनोहर पर गर्व था। सभी लोग एक स्वर में कह रहे थे, शाबाश मनोहर। तुमने अपनी कठोर मेहनत से सिद्ध कर दिया कि, परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।
सत्य ही कहा है- कहिये कम और करिये अधिक क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक या कुछ समय ही रहता है और कार्य का प्रभाव स्थाई होता है।