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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

11-05-2026

‘परिश्रम ही सफलता की कुंजी है’

  •  किसी कार्य में विफल होने पर भी व्यक्ति को निराश नहीं होना चाहिये, बल्कि सफलता प्राप्त करने हेतु पुन: अथक परिश्रम व कठोर प्रयास करना चाहिये। शास्त्रों के अनुसार किसी भी कार्य को करते समय अपने मन को अन्य भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। इतिहास गवाह है कि परिश्रम और प्रयास में शारीरिक कमियां, विशेष अड़चन, अवरोध नहीं डालती और कर्मठ एवं परिश्रमी, लगनशील लोग अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेते हैं। महर्षि अष्टावक्र आठ जगह से टेड़े-मेड़े थे, चाणक्य को अति कुरूप मान्य जाता है। सुकरात की कुरूपता भी प्रख्यात है, आद्य शंकराचार्य भगंदर के घोड़े से प्रभावित थे, सूरदास अंधे थे। कुमारी केलरी, गूंगी बहरी और अंधी थी पर उसने अनेक भाषाओं और विषयों में स्नातक की डिग्रियां हासिल की। उपरोक्त वर्णित अन्य लोगों ने भी अपने-अपने क्षेत्र में अचाईयों को छुआ।

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‘परिश्रम ही सफलता की कुंजी है’

 किसी कार्य में विफल होने पर भी व्यक्ति को निराश नहीं होना चाहिये, बल्कि सफलता प्राप्त करने हेतु पुन: अथक परिश्रम व कठोर प्रयास करना चाहिये। शास्त्रों के अनुसार किसी भी कार्य को करते समय अपने मन को अन्य भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। इतिहास गवाह है कि परिश्रम और प्रयास में शारीरिक कमियां, विशेष अड़चन, अवरोध नहीं डालती और कर्मठ एवं परिश्रमी, लगनशील लोग अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेते हैं। महर्षि अष्टावक्र आठ जगह से टेड़े-मेड़े थे, चाणक्य को अति कुरूप मान्य जाता है। सुकरात की कुरूपता भी प्रख्यात है, आद्य शंकराचार्य भगंदर के घोड़े से प्रभावित थे, सूरदास अंधे थे। कुमारी केलरी, गूंगी बहरी और अंधी थी पर उसने अनेक भाषाओं और विषयों में स्नातक की डिग्रियां हासिल की। उपरोक्त वर्णित अन्य लोगों ने भी अपने-अपने क्षेत्र में अचाईयों को छुआ।


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