दिन में हम कितनी बात करते हैं, यह हमारी मेंटल हैल्थ से जुड़ी बात है। यह कम्यूनिटी और कनेक्शन कम होने का संकेत देता है। पूर्व सर्जन जनरल विवेक मूर्ति के अनुसार अमेरिका अकेलेपन का शिकार हो रहा है। अकेलापन हर व्यक्ति के लिये एक बात नहीं है बल्कि अलग है। एनेलिस्ट ने दुनियाभर से करीब दो हजार लोगों की रिकॉर्डिंग ली और एक पैटर्न को समझने का प्रयास किया। 2005 से 2019 के बीच की रिकॉर्डिंग में यह नोटिस किया गया कि प्रतिदिन व्यक्ति 300 शब्द कम बोल रहा है। चालू वर्ष से बीते वर्ष में यह तुलना की गई। यानि कि वह चुप हो रहा है। मिसोरी-कानसस सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ एरीजोना के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में कहा कि 10 से 94 वर्ष के लोगों को शामिल किया गया। यह भी बताया गया कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले में ज्यादा शब्द बोलती है। लेकिन दुनिया में यह क्लियर पैटर्न नजर आया कि बातचीत का दायरा घट रहा है। इसका कारण टैक्ट मैसेज, ई-मेल और सोशियल मीडिया को भी बताया गया। कुछ बातचीत डिजिटल कम्यूनिकेशन में परिवर्तित हो गई है। सबसे ज्यादा युवा इस परिवर्तन में जद में आये हैं और इसने उनके मानसिक स्वास्थ को कमजोर किया है। उनके अनुसार बेशक यह केवल एक शोध है और इसे ताबुत की आखिरी कील नहीं माना जा सकता। यह अवश्य कहा जा सकता है कि शब्दों के कम बोल अकेलेपन से जुड़ रहे हैं और ई-मेल, मैसेज में माइगे्रट हो रहे हैं। इस विषय पर और रिसर्च की जरूरत है। कम बोलने का सीधा अर्थ है कम लोगों से कनेक्शन बनाना। यह सीधे तौर पर अकेलेपन से जुड़ता है। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रतिदिन संवाद की प्रक्रिया चलना, मनुष्य के ओवरऑल स्वास्थ्य से जुड़ा है। जान पहचान वाले, मित्रों, सहकर्मियों या परिवार से बातचीत ज्यादा न हो लेकिन यदि अजनबी से भी छोटी सी बात हो पाये तो यह व्यक्ति के मूड को बेहतर बनाता है। जो लोग सकारात्मक संवाद करते हैं, वे खुश रहते हैं। न्यूरोसाइंटिस्ट के अनुसार सोशियल कनैक्शन में कमी, हमारे दिमाग को नुकसान पहुंचाती है। जब हम ऑफिस में होते हैं तो ई-मेल या टेक्स्ट मैसेज के बजाय फोन कॉल करें। साइंस के अनुसार यह भावनात्मक तौर पर ज्यादा असर छोड़ता है।