सतीश धवन का बहुत लोगों ने नाम सुना होगा, वे इसरो के चेयरमैन थे। मैंने अपनी कारपेट इंडस्ट्ी की बहुत छोटी शरूआत जब की थी, उन्हीं दिनों में अखबारों में खबर पढ़ी थी कि भारत ने जो पहला सैटेलाइट एसएलवी-3 लांच किया था, वह कामयाब नहीं हो पाया। कामयाबी नहीं मिलना उतनी बड़ी बात नहीं है, जितनी बड़ी बात यह कि प्रयास तो किया। इस राकेट को बनाने के लिए परियोजना निदेशक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने बहुत लंबे समय तक काम किया, रातों को नींद त्याग कर उन्होंने देश के इस बड़े स्वप्न को पूरा करने का प्रयास किया था। सैटेलाइट अंतरिक्ष तक नहीं पहुंच सका और मिशन नाकाम रहा। एपीजे अब्दुल कलाम बहुत निराश हुए और हताश भी, उन्हें भी लगा कि यह निराशा उनकी ही नहीं देश की भी रहेगी। चूंकि इस मिशन का नेतृत्व वे कर रहे थे, तो वे मीडिया के सामने आकर अपनी विफलता स्वीकार करना चाह रहे थे और अपनी स्थिति को स्पष्ट करना भी। पर इसरो के चेयरमैन सतीष धवन ने उन्हें ऐसा करने से रोका और कहा कि आपने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, कामयाबी अभी नहीं मिली कोई बात नहीं आगे मिल जायेगी। आप रहने दीजिये, मीडिया को हम फेस करेंगे। इसके बाद प्रोफेसर सतीष धवन मीडिया के सामने आये और जिम्मेदारी खुद पर ली और कहा कि इस विफलता के लिए वे जवाबदेह हैं, लेकिन यह मिशन थमा नहीं है, प्रयास जारी हैं और आगे कामयाबी मिलेगी, इसका पूरा भरोसा है। प्रोफेसर सतीश धवन की इस स्वीकारोक्ति ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसरो जैसे संगठन का अध्यक्ष, भारत के अंतरिक्ष मिशन का कर्ता-धर्ता, अंतरिक्ष विज्ञान क्षेत्र का बड़ा विशेषज्ञ इस तरह से आगे आकर अपने सहकर्मी की विफलता का जिम्मा खुद ले, इससे बड़ी महानता और क्या होगी। इस तरह उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की विफलता को खुद ओढ़ा, अब्दुल कलाम को निराशा से बचाया और विफलता की स्वीकारोक्ति से बचाया। वे नहीं चाहते थे कि अब्दुल कलाम निराश होकर फिर से विफलता की ओर चले जायें, बल्कि उन्हें पता था कि अब्दुल कलाम में पोटेंशियल है और वे इस मिशन को कामयाब कर दिखायेंगे। एक युवा वैज्ञानिक की विफलता उसकी राह में अवरोध न बन जाये यह कोशिश प्रोफेसर सतीष धवन ने की और जो था वह खुद सहज भाव से स्वीकार किया।
इसका नतीजा क्या निकला, नतीजा यह निकला कि केवल एक साल बाद ही 1980 में भारत ने अपना पहला सैटेलाइट एसएलवी-3 अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया। पूरे देश में खुशी, उल्लास और गर्व की अनुभूति थी। यहां एक कदम प्रोफेसर सतीश धवन ने और बढ़ाया और एपीजे अब्दुल कलाम को ही कहा कि जाईये, मीडिया को अब आप फेस कीजिये और बताईये कि यह सफलता किस तरह से अर्जित की। डॉ. अब्दुल कलाम इस दिशा निर्देष के आगे नतमस्तक थे, विनम्र भाव से कहा कि सर विफलता आप ने ओढ़ी है, सफलता की चादर आपको समर्पित है। पर प्रोफेसर सतीश धवन ने कहा कि मैं सीनियर हूं, मेरे आदेश की पालना करें, इससे आगे नो कमेंट्स एंड नो फर्दर आस्किंग। डॉ. अब्दुल कलाम के पास शब्द नहीं थे। वे अपने अन्य साथियों के साथ मीडिया में गये और एसएलवी-3 की सफलता के बारे में विस्तार से बताया। प्रोफेसर सतीश धवन का यह अंदाज डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम उम्र भर नहीं भूल पाये और उन्हें बहुत बड़ी प्रेरणा उनसे मिली। यहां उन्होंने सीखा कि एक सच्चा लीडर क्या होता है और कैसे करता है। यह प्रोफेसर सतीश धवन की सदाशयता थी कि उन्होंने उस तरह के नेतृत्व को प्रोत्साहित किया जो आगे चलकर देश का राष्ट्रपति बना। बस यही बात है कि किसी का भरोसा कैसे किया जाता है और फिर भरोसा कैसे जीता जाता है। यही इस देश की बड़ी परंपरा है और संस्कृति भी। हम अपने निजी, पारिवारिक, व्यवसायिक, सामाजिक व राजनीतिक जीवन में जब निगाह डालते हैं तो वे लोग ही सच्चे नेतृत्वकर्ता अर्थात लीडर माने गये हैं जो किसी की विफलता को खुद ग्रहण कर लें और सक्षम नेतृत्व को आगे बढऩे की राह प्रशस्त करें। प्रोफेसर सतीश धवन का यह अनुकरणीय कदम आज भी जब याद आता है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं और हम यह सोचने को विवश हो जाते हैं कि दुनिया में इस तरह के भी लोग रहे हैं। हमने खुद उनके उदाहरण देख-सुने और पढ़े हैं। इस तरह का सोच किसी व्यवसायिक संस्थान में हो तो उसकी प्रगति कोई नहीं रोक सकता।