कॉनकॉर्ड को बंद हुए 23 साल हो गए लेकिन आज भी इसे एविएशन हिस्ट्री का सबसे एडवांस्ड एयरक्राफ्ट माना जाता है। यह दुनिया का पहला कमर्शियल एयरक्राफ्ट था जो 2 मैक यानी आवाज से दोगुनी रफ्तार पर उड़ सकता था। इसकी टेक्नोलॉजी इतनी जटिल थी कॉकपिट में दो पायलट के साथ ही एक फ्लाइट इंजीनियर भी रहता था। इसके कॉकपिट में 200 से अधिक मीटर, स्विच और मॉनिटरिंग सिस्टम लगे होते थे। फ्लाइट इंजीनियर फ्यूल, इंजन और बैलेंसिंग सिस्टम को मॉनिटर करता था। इसे उड़ाना मुश्किल था क्योंकि फ्लाइट के दौरान भी इसका सेंटर ऑफ ग्रेविटी यानी गुरुत्व केंद्र लगातार बदलता रहता था। कॉनकॉर्ड एयरक्राफ्ट में 95 टन फ्यूल 13 अलग-अलग जगह लगे टैंकों में भरा रहता था। सुपरसोनिक स्पीड पर पहुंचने पर विमान के ऊपर बनने वाला वायु गतिकीय दबाव बदल जाता था, जिससे उसका बैलेंस पीछे की ओर खिसकने लगता था। इसे मैनेज करने के लिए फ्लाइट इंजीनियर फ्लाइट के दौरान ही फ्यूल को आगे व पीछे के टैंकों में शिफ्ट करता रहता था। कई बार 20 टन फ्यूल एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पंप करना पड़ता ताकि एयरक्राफ्ट हिचकोले न खाए। कॉनकॉर्ड की टॉप स्पीड 2 हजार किमी थी और लंदन से न्यूयॉर्क केवल साढ़े तीन घंटे में पहुंचा देता था। दुनियाभर के इलीट्स के बीच लोकप्रिय कॉनकॉर्ड किसी सफेद हाथी से कम नहीं था। महंगा पडऩे के कारण 2003 में कॉनकॉर्ड बंद कर दिया गया। 2000 में हुए एक क्रेश में 113 लोगों की मौत कॉनकॉर्ड की इलीट पहचान के लिए बड़ा झटका साबित हुई। इसके बाद सेफ्टी अपग्रेड करने से एयरक्राफ्ट ऑपरेशन्स और महंगे हो गए। फ्यूल एफीशिएंसी बहुत कम होने के कारण इसका टिकट हाई सोसायटी ही अफोर्ड कर पाती थी। दूसरी बड़ी समस्या सोनिक बूम यानी सुपरसोनिक स्पीड पर कॉनकॉर्ड की आवाज तेज होती थी इसलिए अधिकांश लैंड एरिया (भूमि क्षेत्रों) के ऊपर तेज गति से इसे उडऩे की अनुमति नहीं थी। इससे रूट सीमित हो गए। 2001 के बाद ग्लोबल एविएशन इंडस्ट्री में स्लोडाउन आ गया, ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ गई और कॉनकॉर्ड की आउटडेटेड टेक्नोलॉजी ने इसका बिजनस केस खत्म कर दिया। नतीजा कॉनकॉर्ड बंद हो गया। लेटेस्ट है कि अमेरिका ने कॉनकॉर्ड पर लगा ओवरलैंड फ्लाइट बैन हटा लिया है इसके फिर उड़ान शुरू करने की चर्चा हो रही है।