बेंगलुरु में आयोजित हाइरॉक्स ने भारत के अर्बन फिटनेस कल्चर को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। इस इवेंट में करीब 9 हजार लोगों ने हिस्सा लिया और हर एक ने 100 डॉलर यानी लगभग 9,300 की रजिस्ट्रेशन फीस चुकाई,। इस तरह दो दिन के इस इवेंट के आयोजकों की 8 करोड़ से ज्यादा कमाई हुई। इसका सीधा मतलब है कि फिटनस अब केवल हेल्थ तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक प्रीमियम एक्सपीरियंस और लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुकी है। हाइरॉक्स वल्र्ड सीरीज ऑफ फिटनस रेसिंग में 8 किलोमीटर की दौड़ और 8 हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट स्टेशन होते हैं। हर 1 किलोमीटर दौड़ के बाद पार्टिसिपेंट्स को स्कीएर्ग, स्लेड पुश, बर्पी, रोइंग, सैंडबैग लंज और वॉल बॉल्स जैसा एक कठिन वर्कआउट करना होता है। खास बात यह है कि इसका फॉर्मेट दुनिया भर में एक जैसा रहता है, जिससे बेंगलुरु में पार्टिसिपेट करने वाला एथलीट बर्लिन या लंदन में भाग लेने वालों से सीधी तुलना कर सकता है। हालांकि सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब यही वर्कआउट पार्क या जिम में कम खर्च या मुफ्त में किया जा सकता है, तो फिर इतनी बड़ी फीस क्यों दी जाए। कुछ आलोचकों ने इसे इंस्टाग्राम के लिए फिटनेस बताया, जहां लोग असल फिटनेस से ज्यादा सोशल वैलिडेशन और फोटो-ऑप्स के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं। इसमें भाग लेने वाले बड़ी तादाद ेमें ऐसे लोग थे जो दूसरे शहरों से ट्रेवल कर आए थे। इन लोगों ने 20-30 हजार रुपये खर्च किए होंगे। हाइरॉक्स के ऑर्गेनाइजर कहते हैं कि सिर्फ वर्कआउट नहीं बल्कि एक एक्सपीरियंस है जहां व्यक्ति अपने शारीरिक और मानसिक स्तर को परख सकता है। टाइमिंग सिस्टम, लाइव माहौल, और भीड़ का उत्साह इसे एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। कई प्रतिभागियों ने इसे रियलिटी चेक बताया। हाइरॉक्स कोई नई एक्सरसाइज नहीं लाता—दौडऩा, वजन उठाना, पुश और पुल करना लोग पहले से करते आए हैं। लेकिन इसे एक ब्रांडेड, ग्लोबल और हाई-एनर्जी इवेंट में बदल दिया गया है, जहां फिटनेस के साथ-साथ अनुभव, कम्युनिटी और स्टेटस भी जुड़ जाता है।