तुवर का घरेलू उत्पादन कम हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन बाजारों में ग्राहकी कमजोर होने तथा चेन्नई से बिकवाली घटाकर होने से बाजार टूट कर पानी पानी हो गया है। अब आयात महंगा को देखकर भविष्य में 400 रुपए की और तेजी लग रही है। देश में तुवर की फसल खरीफ एवं रबी दोनों सीजन में आती है तथा दोनों ही घरेलू फसलें आ चुकी है। इस बार बिजाई कम होने के साथ-साथ पहले जुलाई की बरसात एवं बाद में अक्टूबर-नवंबर की बरसात से दोनों ही फसलों को भारी नुकसान हुआ था। यही कारण है कि मंडियों में आपूर्ति काफी घट गई है। अभी तक सटोरियों द्वारा आगे के डिलीवरी के सौदे सस्ते बेचे जाने से बाजार एक-डेढ़ माह के अंतराल लेमन तुवर का 8300 से लुढक़ कर 7650 रुपए प्रति कुंतल पिछले सप्ताह नीचे में यहां बन गया था तथा लगातार चालू सप्ताह के पूर्वार्ध में 7700 से 7750 रुपए के आसपास यहां घूमती रही। अब नीचे वाले भाव में माल नहीं मिलने तथा दाल मिलों की पकड़ मजबूत होने से सुधार हो गए हैं तथा नई लेमन तुवर 7800 रुपए प्रति क्विंटल बोलने लगे हैं। बर्मा में पुरानी तुवर समाप्त हो गई है, नई तुवर के भाव 820 से बढक़र 835 डॉलर प्रति टन हो गए हैं, जो यहां आकर 8150 रुपए प्रति क्विंटल से ऊपर पड़ रही है, जबकि उन मालों के भाव 7800 बोले जा रहे हैं। यही कारण है कि अब यहां से घटने की गुंजाइश नहीं है। चेन्नई से भी नई तुवर के पड़ते यहां की अपेक्षा 200 रुपए ऊंचे हो गए हैं, इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान भाव की तुवर में 400 रुपए प्रति कुंतल बढऩे की संभावना है। वास्तविकता यह है कि नीमच लाइन में भी घरेलू तुवर कम आई है तथा 78 प्रतिशत कटनी लाइन की दाल मिलों ने खरीद लिया है तथा वहां भी लेमन तुवर के पड़ते ऊंचे लग रहे हैं, खपत के अनुरूप नीमच लाइन में भी इस बार तुवर नहीं आई है। उधर गया, नगरउटारी, नगर पट्टू लाइन की तुवर मुजफ्फरपुर पटना लाइन की दाल मिलू खरीद रही है। महाराष्ट्र के अकोला जलगांव खामगांव जालना लाइन से माल के पड़ता नहीं लग रहे हैं तथा दालें 200 रुपए प्रति क्विंटल डिस्पेरेटी में बिक रही है। यही कारण है कि अब यहां से व्यापार लाभदायक लग रहा है। गत वर्ष सूअर का उत्पादन 54 लाख मीट्रिक टन के करीब हुआ था, जो इस बार 42 लाख मीट्रिक टन आने का अनुमान आ रहा है।