जौ का उत्पादन कम होने तथा सीरिल्स कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक खरीद चलने से नीचे के भाव से 300/350 रुपए प्रति कुंतल की उत्पादक मंडियों में तेजी आ गई है तथा अभी खपत वाले उद्योगों की लिवाली चल रही हैं तथा मंडियों में आपूर्ति 50-55 प्रतिशत टूट गई है, इसे देखते हुए इसमें 200/250 रुपए की और तेजी लग रही है। बीते सीजन में किसानों को जौ में ज्यादा ऊंचे भाव नहीं मिलने से बिजाई में रुझान कम था। यही कारण है कि गत वर्ष जौ की बिजाई 6.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र हुई थी, जबकि इस बार 5.76 लाख हेक्टेयर में होने का अनुमान आया था, जिस कारण इसका उत्पादन 19.25 लाख मीट्रिक टन से घटकर 17.70 लाख मीट्रिक टन जाने का ताजा अनुमान चालू वर्ष में विशेषज्ञ लगा रहे हैं। अभी तक उत्पादक मंडियों में आपूर्ति इस बार गत वर्ष की समान अवधि की तुलना में 32 प्रतिशत कम हो रही है। गौरतलब है कि जौ का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य राजस्थान है तथा दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश एवं यूपी है। हम मानते हैं कि किसानों द्वारा उन्नतशील प्रजाति के जौ की बिजाई किया गया था, लेकिन जनवरी में गर्म मौसम हो जाने तथा मार्च में मौसम खराब होने से जौ का यील्ड कम बैठा है। दूसरी ओर किसानों के माल पहले ही कट चुके थे तथा उन्हें उपज के अनुरूप कीमतें नहीं मिलने से बिजाई कम किए थे। राजस्थान के श्रीगंगानगर लाइन में 2080 रुपए प्रति क्विंटल गोदाम पहुंच में बिकने के बाद 2350 रुपए प्रति क्विंटल भाव हो गए हैं, बढिय़ा काउंट के माल 2400 रुपए तक बोलने लगे हैं। मध्य प्रदेश की मंडियों में भी 1975/2025 रुपए बिकने के बाद अब 2270/2320 रुपए भाव बोलने लगे हैं। कानपुर हमीरपुर बांदा लाइन में भी जॉब के भाव 2285/2310 रुपए प्रति क्विंटल गोदाम पहुंच में बोलने लगे हैं। उत्पादन में जबरदस्त कमी है, वहीं खपत वाले उद्योगों की चौतरफा मांग निकलने लगी है। इधर टेंडर वाले भी जौ की खरीद करने लगे हैं तथा पौष्टिक आहार वालों की भी मांग निकलने लगी है। यही कारण है कि जौ के भाव धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं। इस बार यील्ड कम बैठा है, पुराना स्टॉक भी, गत वर्ष की अपेक्षा 30-31 प्रतिशत कम बचा है, इन सारी परिस्थितियों में जौ का व्यापार आगे चलकर 200/250 रुपए प्रति क्विंटल की और तेजी आ सकती है।