आजकल दुनिया में यह चर्चा का विषय है कि किसी देश के पास ऐसी क्या खास या Exclusive चीज है जो किसी और देश के पास नहीं है और जिसे लोग प्रीमियम पर यानि मनमांगी कीमत पर भी लेने को तैयार है। हमारे देश में ऐसी कितनी खास चीजें है इसपर आप विचार करें पर भारत में पैदा होने वाले ‘आम’ के दीवाने सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अमरीका सहित पूरी दुनिया में मौजूद है जो सीजन के समय भारत के आम का स्वाद हर कीमत चुकाकर लेना चाहते हैं। भारत में 2 करोड़ मेट्रिक टन से ज्यादा आम हर साल पैदा होता है जो 12 हफ्तो के पीक सीजन के दौरान दुनिया में होने वाली कुल आम की सप्लाई के आधे हिस्से के बराबर है। हमारे यहां महाराष्ट्र के रत्नागिरी से अल्फांसों (हापुस), गुजरात से केसर, उत्तर भारत से चौसा व लंगड़ा और दक्षिण से बगंनपल्ली सीजन में पैदा होने वाली आम की मशहूर वैरायटियां है जिनका टेस्ट मीठा होता है व जिन्हें प्रीमियम फल माना जाता है। राजस्थान के कई शहरों में मुम्बई से आने वाली ट्रेनों में रत्नारगिरी आम की पेटिया रोजाना सैकड़ों की संख्या में आती है। आजकल जयपुर में हापुस आम की 12 पीस की पेटी 1300-1500 रुपये के बीच मिल रही है। अमरीका में रहने वाले भारतीय लोगों के साथ-साथ अमरीकी लोग भी भारत के आम का हर सीजन में इंतजार करते हैं। वहां हमारे आम के ऐसे दीवाने हैं जो अपने व्हाट्सएप पर Mango alert यानि आम के आने की सूचना मिलते ही सब काम छोडक़र सबसे पहले अपने लिए आम की बुकिंग करवाते हैं। वहां लोग जिस फ्लाइट में आम आ रहे हैं उसकी अपडेट लेते रहते हैं और जल्दी सुबह या देर रात गोदाम में जाकर अपने आम इस तरह लेकर निकलते हैं मानो उन्हें कोई खजाना मिल गया हो। भारत से आम इंपोर्ट करने वाले एक कारोबारी का कहना है कि यहां आम की सप्लाई आते ही तुरंत बिक जाती है। अमरीका में भारत के आमों पर से वर्ष 2007 में रोक हटी थी जिसके बाद वहां भारत के आम को भगवान के फल की तरह देखा जाता है जो बिना किसी प्रयास के अपने आप बिकता है। वर्ष 2006 में जब अमरीकी राष्ट्रपति बुश भारत आए तब उन्होंने आम चखकर उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि यह क्या शानदार फल है जिसके बाद अमरीका में भारत के आम बिकने का रास्ता खुला। बुश की इस बात को अमरीका में आम इंपोर्ट करने वाले आज तक दोहराते हैं।
अमरीका में भारत के 10-12 आमों की पेटी 50-60 डॉलर यानि 4700-5700 रुपये में बिकती है मतलब एक आम करीब 400-500 रुपये का होता है। पिछले साल यही पेटी 40-50 डॉलर में बिक रही थी पर महंगाई और ट्रांसपोर्ट के खर्चे बढऩे से इस साल यह महंगी बिक रही है। आम की सप्लाई का सिस्टम इतना नाजुक है कि फसल कटने के 7-10 दिनों में अगर आम खेत से निकलकर कस्टमर तक न पहुंचे तो इसके खराब होने का खतरा पैदा होने लगता है। इस कारण दूसरे देशों में आम इंपोर्ट करने वाले हमेशा इस चिंता में रहते हैं कि सप्लाई चेन में कही भी देरी या रूकावट आई तो उन्हे बड़ा नुकसान हो सकता है क्योंकि ज्यादातर इंपोर्टर 10-20 प्रतिशत मार्जिन पर ही काम करते हैं। एक इंपोर्टर को 40 हजार डॉलर का नुकसान सिर्फ इसलिए हो गया क्योंकि इंपोर्ट के कागजों में कमी के कारण कस्टम वालों ने पूरे आम के शिपमेंट को नष्ट कर दिया। अमरीका में मेक्सिको से भी आम आते हैं पर भारत के आम उनके मुकाबले 5 गुना ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। इस साल अप्रेल महीने में एडवांस में ऑर्डर देकर आम की बुकिंग करवाने की लिमिट भारत से आम का पहला शिपमेंट निकलने से पहले ही पूरी हो चुकी थी यानि आम यहां से रवाना होने से पहले ही बिक चुके थे। अमरीका में एक भारतीय इंपोर्टर एक हजार डॉलर में आम का ‘सीजन पास’ ऑफर कर रहा है जिसमें सीजन के दौरान हर हफ्ते एक आम की पेटी मंगवाई जा सकती है। खास बात यह है कि भारत के आम के सबसे Loyal कस्टमर अमरीकी लोग है क्योंकि वे भारतीयों की तरह कीमतों को लेकर ज्यादा सोच-विचार नहीं करते। अगर भारत के आम के पूरे कारोबारी स्वरूप का बारिकी से विशेषण करें तो पता चलता है कि कैसे कोई खास चीज एक ऐसी ताकत दे सकती है जिससे हम अपनी कीमत पर उसे पूरी दुनिया में बेचने लायक बन जाते हैं। भले ही ज्यादातर सेक्टरों में हम कीमतों पर अपना कंट्रोल न जमा पाए पर कुछ मामलों में ऐसा जरूर संभव है जिनपर फोकस करते हुए उन्हें बड़ी संख्या में अपनी कीमत पर दुनियाभर में बेचकर ग्लोबल बाजार पर पकड़ मजबूत की जा सकती है और ‘भारतीय आम’ इसका दिलचस्प उदाहरण है।