सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रामोजी राव की मौत के बाद भी मार्गदर्शी फाइनैंसियर्स के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही समाप्त नहीं होती। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि किसी वित्तीय संस्था का अस्तित्व जारी रहने पर उसकी कानूनी जवाबदेही भी बनी रहती है, भले ही उसके प्रमोटर का निधन हो गया हो। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि कार्यवाही के दौरान संस्था की संपत्तियों को अटैच (जब्त) करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। यह मामला एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) से उत्पन्न हुआ है, जिसमें अगस्त 2025 के तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें मार्गदर्शी फाइनैंसियर्स के खिलाफ आम जन से गैर कानूनी तरीके से जमा लेने से जुड़े आर्थिक अपराध के मामले में आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया था। प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि रामोजी राव की मृत्यु को देखते हुए मामला बंद कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हलफनामे में जमाकर्ताओं के बकाया का भुगतान करने का विवरण दिया जाएगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यह विवाद केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संस्था द्वारा कथित रूप से किए गए वैधानिक उल्लंघनों का प्रश्न भी शामिल है। अदालत ने कहा जहां संस्थागत आचरण और वित्तीय नियमों के अनुपालन से जुड़े आरोप हों, वहां जांच जारी रहनी चाहिए। याचिका के अनुसार, मार्गदर्शी फाइनैंसियर्स पर आरबीआई एक्ट की धारा 45एस का उल्लंघन करते हुए जनता से जमा जुटाने का आरोप है। आरोप है कि कंपनी ने हजारों करोड़ रुपये की उगाही की। वर्ष 2023 में आंध्र प्रदेश सरकार ने सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्तियों को अटैच करने का आदेश भी दिया था।