घर-घर में जगह बना चुके इंवेस्टमेंट के बाजार यानि मुख्य रूप से शेयर बाजार अगर कुछ दिनों तक तेजी के मूड में रहते हैं तो ज्यादातर इंवेस्टर यह समझने लगते हैं कि बाजारों में आगे क्या होगा यह उन्हें अच्छी तरह पता है, लेकिन बाजार समय-समय पर यह साबित करते आए हैं कि उनके बिहेवियर को पकड़ पाना लगभग नामुमकिन है। Common Sense के हिसाब से शेयरों की कीमतें इसलिए बढ़ती है क्योंकि लोग उन्हे खरीदते हैं, यह देखकर और ज्यादा लोग उन्हे खरीदने लगते हैं जिससे कीमतें और बढ़ती जाती है। यह निर्णय ज्यादातर इंवेस्टर कंपनी की परफोर्मेंस देखकर करते हैं पर कई इंवेस्टर ऐसे भी है जो टिप्स के भरोसे खरीददारी करते है। पिछले 1-2 महीनों में जो बदलाव दिख रहा है उसमें रिटेल इंवेस्टर टैरिफ वॉर व अमरीका-इजराइल और ईरान युद्ध जैसी निगेटिव स्थितियों के बावजूद बाजारों में लगातार खरीददारी कर रहे हैं। इंवेस्टरों का यह व्यवहार शायद इतिहास में पहली बार देखा जा रहा है जहां उन्हें किसी बात की चिंता नहीं है बल्कि उनका कांफिडेंस ऐसा है कि बाजार सिर्फ तेजी में रहने के लिए बने हैं। कंपनियों की बढ़ती सेल्स व प्रोफिट बाजारों को आगे बढ़ाने में सबसे बड़ा रोल निभाते है और ज्यादातर कंपनियों की परफोर्मेंस अभी तक बेहतर ही रही है। इंवेस्टर यह ध्यान रखना भूल जाते है कि जो घटनाएं पिछले 1-2 महीनों में हुई है उनका असर कंपनियों की परफोर्मेंस पर आते-आते 4-6 महीने लगते हैं पर आजकल चल रहे खरीददारी के माहौल तब तक इंतजार करने के लिए कोई तैयार नहीं है। एक सवाल यह भी है कि क्या हमारे बाजार किसी तरह की Bubble में पहुंच गए हैं? यह पता लगाना आज सबसे मुश्किल काम बन गया है क्योंकि अगर इंवेस्टर ऐसा कर पाते तो शायद Bubble बनने का प्रोसेस शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता। इससे भी ज्यादा यह समझते रहना जरूरी है कि बाजारों में लोग जिन्हे महंगा मानने लगते है उनके कारण Bubble बनने के संकेत दिए जाते है जबकि सच्चाई यह है कि हर समय कोई न कोई सेक्टर या कुछ कंपनियां दूसरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से आगे बढ़ती है जिनकी तेजी को Bubble से जोडक़र देखा जाने लगता है। एक इंवेस्टर ने कहा कि जब वह सोचता है कि बाजार Bubble में आ रहे है या महंगे है तभी बाजार और तेजी दिखाने लगते है।
ऐसे उदाहरण हाल के वर्षों में व इतिहास में कई बार सामने आए है जब महंगे लगने वाले बाजार ने सभी की इंटेलिजेंस को फेल करते हुए और ज्यादा तेजी दिखाई। बाजारों को समझने के कुछ सिम्पल व आसान फार्मूले बरसों से मशहूर रहे हैं जो शायद कभी फेल नहीं हुए। बाजारों के Bubble में या महंगा होने का अंदाजा तब लगता है जब ज्यादातर शेयरों की कीमतें Bubble पर पहुंच जाती है, ट्रेडिंग वॉल्यूम में असामान्य बढ़ोतरी दर्ज होती है व बाजारों में Bubble (उतार-चढ़ाव) ज्यादा गैप में होने लगती है। इनके अलावा जब घर में, नाई की दुकान पर, सब्जी वाले के यहां यानि हर जगह लोगों का फेवरेट ञ्जशश्चद्बष् शेयर बाजार बन जाए तब यह माना जा सकता है कि बाजार वाकई में Bubble में आ गए हैं जो आज नहीं तो कल फट सकता है। एक और दिलचस्प स्थिति है जो बताती है कि बाजार या शेयरों के भाव महंगे हो चुके हैं जिसमें पहले ही बहुत महंगे हो चुके शेयरों पर इंवेस्टर अपना कांफिडेंस दिखाते हुए उन्हे खरीदने की सलाह देने लगे व उनके फायदे गिनाने लगे तो यह समझना गलत नहीं होगा कि वहां Bubble बन रहा है। ऐसे शेयरों को चाहने वाले उनके खिलाफ कुछ भी निगेटिव सुनना पसंद नहीं करते और न ही उससे सहमत होते है। ऐसा 1999 में इंटरनेट शेयरों की बूम के दौरान व 2021 में बिटकॉइन की तेजी में हो चुका है जो कई इंवेस्टरों को जरूर याद होगा। बाजारों में आज ऐसी स्थितियां नहीं दिख रही है यानि बाजारों के Bubble में होने के संकेत मौजूद नहीं है। हालांकि कल या अगले कुछ दिनों में ग्लोबल स्तर पर क्या हो जाए यह कोई नहीं बता सकता। अभी बाजारों में निगेटिव रिटर्न व गिर चुकी पोर्टफोलियो वेल्यू को लेकर बहुत लोग चिंता में जरूर है लेकिन बहुत से इंवेस्टर ऐसे भी हैं जो खरीदने की स्पीड बढ़ा रहे है यानि अभी भी रिकवरी व तेजी का इंतजार ज्यादातर इंवेस्टर कर रहे है। जो लोग अपने सलाहकारों Bubble या एक्सपर्टों की राय पर बाजारों में इंवेस्ट करते हैं उनके लिए यह सच जानना जरूरी है कि ये लोग बाजारों के बारे में कुछ भी ऐसा नहीं जानते जो आम इंवेस्टर को पता न हो भले ही वे कुछ भी दावा करे या शानदार रिटर्न के सपने दिखाए क्योंकि बाजारों की चाल का पता लगाने की काबिलियत देने वाली इंटेलिजेंस आजतक डवलप नहीं हो पाई है। यही कारण है कि शेयर बाजारों से वेल्थ बनाने में कामयाब हुए ज्यादातर लोग बाजारों के बिहेवियर की जगह कंपनियों की परफोर्मेंस पर नजर रखते हुए लम्बे समय तक उनके साथ बने रहने को ही एकमात्र सफल फार्मूला मानते हैं जो हर दौर में काम करता आया है।