सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान व्यवस्था दी कि कंज्यूमर्स को उस सेवा के लिए भुगतान करने को बाध्य नहीं किया जा सकता जो उन्हें अब प्राप्त नहीं हो रही हैं, और शुल्क निर्धारण केवल एक गणितीय प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक नियामक संतुलन का कार्य है। न्यायालय ने इसी के साथ पिछले वर्ष फरवरी में विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें निर्देश दिया गया था कि दिल्ली स्थित रिठाला कम्बाइन्ड साइकिल पावर प्लांट की संपूर्ण पूंजी लागत को 15 वर्षों की अवधि में डेफिसिएशंस के माध्यम से वसूल करने की अनुमति दी जाए। न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने एपीटीईएल के आदेश को चुनौती देने वाली दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीईआरसी) की अपील पर अपना फैसला सुनाया। पीठ ने फैसले में कहा, ‘‘शुल्क का निर्धारण महज गणितीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक नियामक संतुलन का कार्य है। उपयोगिताओं के लिए उचित लागत वसूली को सक्षम बनाने के उद्देश्य को कंज्यूमर हितों की रक्षा के सर्वोपरि दायित्व के साथ आकलन और समायोजित किया जाना चाहिए।’’ न्यायालय ने कहा कि इस मामले में, यह स्वीकार तथ्य है कि मार्च 2018 के बाद कंज्यूमर्स को बिजली की आपूर्ति नहीं की गई। पीठ ने कहा, ‘‘कंज्यूमर्स को उस सेवा के लिए भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो उन्हें अब प्राप्त नहीं हो रही है।’’ फैसले में कहा गया कि बिजली खरीद समझौते (पीपीए) के तहत टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (टीपीडीडीएल) को केवल छह साल की अवधि के लिए बिजली की आपूर्ति करनी थी। पीठ ने इस तथ्य पर संज्ञान लिया कि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 61 बिजली दर के निर्धारण को नियंत्रित करती है और धारा 61(घ) विशेष रूप से यह प्रावधान करती है कि दर निर्धारण के लिए नियम और शर्तें निर्दिष्ट करते समय, उपयुक्त आयोग कंज्यूमर्स के हितों की रक्षा करने और साथ ही साथ उचित तरीके से बिजली की लागत की वसूली करने के उद्देश्य से निर्देशित होगा। पीठ ने कहा, ‘‘यह प्रावधान कंज्यूमर कल्याण को एक गौण विचार के रूप में नहीं बल्कि शुल्क निर्धारण में एक केंद्रीय और मार्गदर्शक वैधानिक सिद्धांत के रूप में स्थापित करता है।’’न्यायालय ने रेखांकित किसा कि टीपीडीडीएल ने रिठाला में एक अस्थायी 108 मेगावाट के गैस आधारित बिजली संयंत्र की स्थापना के लिए भूमि आवंटन का प्रस्ताव रखा था, जिसका परिचालन कार्यकाल स्पष्ट रूप से पांच से छह वर्षों तक सीमित था, जिसके बाद भूमि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को वापस मिलनी थी। पीठ ने कहा कि यह परियोजना 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बिजली आपूर्ति बढ़ाने की अत्यावश्यक और तत्काल आवश्यकता से उपजी थी। न्यायालय ने कहा कि मई 2008 में, टीपीडीडीएल ने डीईआरसी को संयंत्र स्थापित करने और संचालित करने की अपनी मंशा से अवगत कराया और अप्रैल 2009 में, आयोग ने टीपीडीडीएल के प्रस्ताव के आधार पर योजना के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दी।