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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

05-05-2026

बाजार में नया POWER SHIFT : किसके हाथ में कंट्रोल ?

  •  भारत के शेयर बाज़ार में इस समय एक बड़ा और दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों में निवेश का संतुलन तेजी से बदल रहा है, जहाँ विदेशी निवेशकों की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है और घरेलू निवेशक—खासतौर पर रिटेल निवेशक और म्यूचुअल फंड—नई ताकत बनकर उभर रहे हैं। 31 मार्च 2026 तक के ताज़ा आंकड़े इस ट्रेंड को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। मिड-कैप कंपनियों में रिटेल निवेशकों का रुख सतर्क दिखाई देता है। Q4FY26के दौरान उन्होंने 37.3% कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि 60.6' कंपनियों में हिस्सेदारी घटा दी। यह संकेत देता है कि बाजार की अस्थिरता के बीच आम निवेशक सोच-समझकर कदम उठा रहे हैं। वहीं, विदेशी निवेशकों (FPI) का रुख भी बहुत मजबूत नहीं दिखा। उन्होंने 47.2% कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, लेकिन 51.4% कंपनियों में घटाई, जो यह बताता है कि वे अभी भी जोखिम से दूरी बनाए हुए हैं। इसके उलट, म्यूचुअल फंड सबसे भरोसेमंद खरीदार बनकर सामने आए हैं। उन्होंने 54.2% मिड-कैप कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, जो घरेलू संस्थागत निवेशकों के मजबूत विश्वास को दर्शाता है। सालाना आधार पर यह ट्रेंड और मजबूत दिखा, जहाँ करीब 67.6% कंपनियों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी। अगर स्मॉल-कैप सेक्टर की बात करें तो तस्वीर थोड़ी अलग लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। यहाँ रिटेल निवेशक ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं। Q4FY26 में उन्होंने करीब 39त्न कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि 59.4% कंपनियों में घटाई। हालांकि सालाना आधार पर देखें तो वे 52% कंपनियों में नेट खरीदार बनकर उभरे हैं। विदेशी निवेशकों ने स्मॉल-कैप में भी दूरी बनाए रखी। उनकी हिस्सेदारी 48.1% कंपनियों में घटी, जबकि केवल 43.5% कंपनियों में बढ़ी। म्यूचुअल फंड्स का रुख यहाँ अपेक्षाकृत संतुलित रहा—उन्होंने 31.3% कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, 27.5% में घटाई, और बाकी में कोई बदलाव नहीं किया। यह दिखाता है कि वे स्मॉल-कैप में ज्यादा सतर्कता बरत रहे हैं और अधिक स्थिर अवसरों पर ध्यान दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल निवेश का नहीं बल्कि रिस्क ट्रांसफर का संकेत है। पहले जो जोखिम बड़े संस्थागत निवेशक उठाते थे, अब वह धीरे-धीरे रिटेल निवेशकों की ओर शिफ्ट हो रहा है।  भारतीय शेयर बाजार अब तेजी से घरेलू निवेश पर निर्भर होता जा रहा है। यह एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि इससे बाजार को स्थिरता मिलती है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी है कि यदि बाजार में गिरावट आती है, तो इसका सबसे ज्यादा असर रिटेल निवेशकों पर पड़ सकता है।

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बाजार में नया POWER SHIFT : किसके हाथ में कंट्रोल ?

 भारत के शेयर बाज़ार में इस समय एक बड़ा और दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों में निवेश का संतुलन तेजी से बदल रहा है, जहाँ विदेशी निवेशकों की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है और घरेलू निवेशक—खासतौर पर रिटेल निवेशक और म्यूचुअल फंड—नई ताकत बनकर उभर रहे हैं। 31 मार्च 2026 तक के ताज़ा आंकड़े इस ट्रेंड को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। मिड-कैप कंपनियों में रिटेल निवेशकों का रुख सतर्क दिखाई देता है। Q4FY26के दौरान उन्होंने 37.3% कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि 60.6' कंपनियों में हिस्सेदारी घटा दी। यह संकेत देता है कि बाजार की अस्थिरता के बीच आम निवेशक सोच-समझकर कदम उठा रहे हैं। वहीं, विदेशी निवेशकों (FPI) का रुख भी बहुत मजबूत नहीं दिखा। उन्होंने 47.2% कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, लेकिन 51.4% कंपनियों में घटाई, जो यह बताता है कि वे अभी भी जोखिम से दूरी बनाए हुए हैं। इसके उलट, म्यूचुअल फंड सबसे भरोसेमंद खरीदार बनकर सामने आए हैं। उन्होंने 54.2% मिड-कैप कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, जो घरेलू संस्थागत निवेशकों के मजबूत विश्वास को दर्शाता है। सालाना आधार पर यह ट्रेंड और मजबूत दिखा, जहाँ करीब 67.6% कंपनियों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी। अगर स्मॉल-कैप सेक्टर की बात करें तो तस्वीर थोड़ी अलग लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। यहाँ रिटेल निवेशक ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं। Q4FY26 में उन्होंने करीब 39त्न कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि 59.4% कंपनियों में घटाई। हालांकि सालाना आधार पर देखें तो वे 52% कंपनियों में नेट खरीदार बनकर उभरे हैं। विदेशी निवेशकों ने स्मॉल-कैप में भी दूरी बनाए रखी। उनकी हिस्सेदारी 48.1% कंपनियों में घटी, जबकि केवल 43.5% कंपनियों में बढ़ी। म्यूचुअल फंड्स का रुख यहाँ अपेक्षाकृत संतुलित रहा—उन्होंने 31.3% कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, 27.5% में घटाई, और बाकी में कोई बदलाव नहीं किया। यह दिखाता है कि वे स्मॉल-कैप में ज्यादा सतर्कता बरत रहे हैं और अधिक स्थिर अवसरों पर ध्यान दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल निवेश का नहीं बल्कि रिस्क ट्रांसफर का संकेत है। पहले जो जोखिम बड़े संस्थागत निवेशक उठाते थे, अब वह धीरे-धीरे रिटेल निवेशकों की ओर शिफ्ट हो रहा है।  भारतीय शेयर बाजार अब तेजी से घरेलू निवेश पर निर्भर होता जा रहा है। यह एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि इससे बाजार को स्थिरता मिलती है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी है कि यदि बाजार में गिरावट आती है, तो इसका सबसे ज्यादा असर रिटेल निवेशकों पर पड़ सकता है।


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