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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

04-04-2026

...तो गोल्डीलॉक को लगेगा शॉक!

  •  ट्रंप टैरिफ पर वैभव यदुवंशी की तरह सिक्सर जडऩे के बाद भारत के सामने रियल चायनामैन चैलेंज आ गया है। ईरान वॉर के चलते दुनिया की सबसे तेज ग्रोथ वाली इकोनॉमी दोधारी तलवार पर है। क्रूड ऑइल, गैस, पेट्रोकेमिकल और फर्टिलाइजर की जरूरी सप्लाई डिसरप्ट हो जाने के कारण प्राइस बढ़ रहे हैं। प्राइस को तो सरकार और इकोनॉमी कुशन कर सकती है लेकिन जरूरी इनपुट की सप्लाई नहीं मिलने से धंधा मंदा होने का खतरा है। भारत सरकार ने इस चैलेंज से निपटने के लिए मंत्रियों के सात ग्रुप बनाए हैं। इसका सीधा अर्थ है ईरान वॉर का भारत की इकोनॉमी के सात सैक्टर पर गहरा असर हो रहा है। एनेलिस्ट कहते हैं कि खतरा महंगाई नहीं बल्कि इकोनॉमी की सुस्ताई (स्लो ग्रोथ रेट) है। यदि ऐसा होता है इंटरेस्ट रेट्स बढऩे का प्लान आगे टल सकता है। चैलेंज यह भी है कि ऑइल एक्सपोर्टिंग 15 देश इस वॉर की चपेट में है जिससे प्रोडक्शन घट रहा है। और...स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसा शिपिंग चैनल बंद होने से असर कई गुना बढ़ गया है। हालात इतने वोलेटाइल (पल में तोला पल में माशा) हैं कि 9 मार्च को जो क्रूड ऑइल 116 डॉलर था वो 80 डॉलर तक गिरने के बाद फिर से 112 डॉलर तक पहुंच गया है। गल्फ वॉर छिडऩे के बाद से एमरजिंग और ग्लोबल मार्केट्स में ब्याज दरें बढ़ी हैं। भारत में अगले 12 महीनों में कम से कम एक बार ब्याज दर बढऩे की संभावना हैं। हालांकि आरबीआई की एमपीसी की मीटिंग 8 अप्रेल को होनी है लेकिन इकोनॉमी ग्रोथ पर पड़ रहे असर के चलते फिलहाल ब्याज दर बढऩे की कोई आशंका नहीं है। वर्ष 2025 में पॉलिसी रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती हुई थी। ट्रंप के प्रेशर के बावजूद फिलहाल इंटरेस्ट रेट्स घटने की उम्मीद कम है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक द्वारा दर बढ़ाने की संभावना है। गोल्डमैन सैक्स के एनेलिस्ट्स के अनुसार, यदि क्रूड ऑइल 100 डॉलर को पार कर जाता है तो दुनियाभर के देशों की मौद्रिक नीति अधिक सख्त हो सकती है।

    गोल्डलॉक्स का द एंड : भारत के लिए क्रूड ऑइल से भी बड़ा चैलेंज डोमेस्टिक और इंडस्ट्रियल गैस सप्लाई का है। इंडस्ट्रियल गैस की सप्लाई बहाल नहीं होने पर बड़ी संख्या में लोगों के बेरोजगार होने का खतरा है। हालांकि शुरुआत में बड़ी कटौती के बाद भारत सरकार धीरे-धीरे  इंडस्ट्रियल गैस सप्लाई में कटौती कम कर रही है। क्योंकि इससे फर्टिलाइजर, पावर और स्टील सहित बहुत से सैक्टरों में प्रोडक्शन प्रभावित हो सकता है। एनेलिस्ट्स के अनुसार यदि गैस सप्लाई चार सप्ताह में सामान्य नहीं हो पाती है तो इसका असर कम से कम एक तिमाही तक ग्रोथ पर दिख सकता है। यदि क्रूड ऑइल की प्राइस तीन से चार तिमाहियों तक लगातार 90-95 डॉलर से ऊपर रहती है, तो अगले वित्त वर्ष में भारत की 7 परसेंट जीडीपी ग्रोथ घटकर लगभग 6-6.5 परसेंट तक आ सकती है। फर्टिलाइजर और बिजली उत्पादन के लिए जरूरी गैस सप्लाई में कटौती से शॉर्ट टर्म मेें जो उत्पादन  घटेगा उसका असर अगले वित्त वर्ष की पहली और दूसरी तिमाही में ग्रोथ पर दिखाई देगा। यानी भारत की इकोनॉमी के गोल्डीलॉक्स फेज को ब्रेक लग जाएंगे। गोल्डीलॉक्स यानी हाई ग्रोथ और लो इंफ्लेशन। पेट्रोल और डीजल की एक्साइज ड्यूटी में की गई कटौती से सरकार को एक साल में करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। डॉयशे बैंक के अनुमान के अनुसार, यदि तेल कीमतों में 10 से 20 परसेंट बढ़ोतरी जितनी ही रिटेल प्राइस बढ़ाई जाती है तो महंगाई 25 से 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। अभी महंगाई 2.75 परसेंट है यानी सरकार के पास यहां थोड़ी सहूलियत है। इससे आरबीआई ग्रोथ को मैनेज करने पर फोकस बढ़ा सकता है। आरबीआई के लिए ब्याज दर बढ़ाना शायद जरूरी न हो, लेकिन यदि तेल महंगा होने से महंगाई 5 परसेंट के करीब पहुंच जाती है, तो ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए ब्याज दर घटा पाना भी मु्श्किल हो जाएगा। 

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...तो गोल्डीलॉक को लगेगा शॉक!

 ट्रंप टैरिफ पर वैभव यदुवंशी की तरह सिक्सर जडऩे के बाद भारत के सामने रियल चायनामैन चैलेंज आ गया है। ईरान वॉर के चलते दुनिया की सबसे तेज ग्रोथ वाली इकोनॉमी दोधारी तलवार पर है। क्रूड ऑइल, गैस, पेट्रोकेमिकल और फर्टिलाइजर की जरूरी सप्लाई डिसरप्ट हो जाने के कारण प्राइस बढ़ रहे हैं। प्राइस को तो सरकार और इकोनॉमी कुशन कर सकती है लेकिन जरूरी इनपुट की सप्लाई नहीं मिलने से धंधा मंदा होने का खतरा है। भारत सरकार ने इस चैलेंज से निपटने के लिए मंत्रियों के सात ग्रुप बनाए हैं। इसका सीधा अर्थ है ईरान वॉर का भारत की इकोनॉमी के सात सैक्टर पर गहरा असर हो रहा है। एनेलिस्ट कहते हैं कि खतरा महंगाई नहीं बल्कि इकोनॉमी की सुस्ताई (स्लो ग्रोथ रेट) है। यदि ऐसा होता है इंटरेस्ट रेट्स बढऩे का प्लान आगे टल सकता है। चैलेंज यह भी है कि ऑइल एक्सपोर्टिंग 15 देश इस वॉर की चपेट में है जिससे प्रोडक्शन घट रहा है। और...स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसा शिपिंग चैनल बंद होने से असर कई गुना बढ़ गया है। हालात इतने वोलेटाइल (पल में तोला पल में माशा) हैं कि 9 मार्च को जो क्रूड ऑइल 116 डॉलर था वो 80 डॉलर तक गिरने के बाद फिर से 112 डॉलर तक पहुंच गया है। गल्फ वॉर छिडऩे के बाद से एमरजिंग और ग्लोबल मार्केट्स में ब्याज दरें बढ़ी हैं। भारत में अगले 12 महीनों में कम से कम एक बार ब्याज दर बढऩे की संभावना हैं। हालांकि आरबीआई की एमपीसी की मीटिंग 8 अप्रेल को होनी है लेकिन इकोनॉमी ग्रोथ पर पड़ रहे असर के चलते फिलहाल ब्याज दर बढऩे की कोई आशंका नहीं है। वर्ष 2025 में पॉलिसी रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती हुई थी। ट्रंप के प्रेशर के बावजूद फिलहाल इंटरेस्ट रेट्स घटने की उम्मीद कम है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक द्वारा दर बढ़ाने की संभावना है। गोल्डमैन सैक्स के एनेलिस्ट्स के अनुसार, यदि क्रूड ऑइल 100 डॉलर को पार कर जाता है तो दुनियाभर के देशों की मौद्रिक नीति अधिक सख्त हो सकती है।

गोल्डलॉक्स का द एंड : भारत के लिए क्रूड ऑइल से भी बड़ा चैलेंज डोमेस्टिक और इंडस्ट्रियल गैस सप्लाई का है। इंडस्ट्रियल गैस की सप्लाई बहाल नहीं होने पर बड़ी संख्या में लोगों के बेरोजगार होने का खतरा है। हालांकि शुरुआत में बड़ी कटौती के बाद भारत सरकार धीरे-धीरे  इंडस्ट्रियल गैस सप्लाई में कटौती कम कर रही है। क्योंकि इससे फर्टिलाइजर, पावर और स्टील सहित बहुत से सैक्टरों में प्रोडक्शन प्रभावित हो सकता है। एनेलिस्ट्स के अनुसार यदि गैस सप्लाई चार सप्ताह में सामान्य नहीं हो पाती है तो इसका असर कम से कम एक तिमाही तक ग्रोथ पर दिख सकता है। यदि क्रूड ऑइल की प्राइस तीन से चार तिमाहियों तक लगातार 90-95 डॉलर से ऊपर रहती है, तो अगले वित्त वर्ष में भारत की 7 परसेंट जीडीपी ग्रोथ घटकर लगभग 6-6.5 परसेंट तक आ सकती है। फर्टिलाइजर और बिजली उत्पादन के लिए जरूरी गैस सप्लाई में कटौती से शॉर्ट टर्म मेें जो उत्पादन  घटेगा उसका असर अगले वित्त वर्ष की पहली और दूसरी तिमाही में ग्रोथ पर दिखाई देगा। यानी भारत की इकोनॉमी के गोल्डीलॉक्स फेज को ब्रेक लग जाएंगे। गोल्डीलॉक्स यानी हाई ग्रोथ और लो इंफ्लेशन। पेट्रोल और डीजल की एक्साइज ड्यूटी में की गई कटौती से सरकार को एक साल में करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। डॉयशे बैंक के अनुमान के अनुसार, यदि तेल कीमतों में 10 से 20 परसेंट बढ़ोतरी जितनी ही रिटेल प्राइस बढ़ाई जाती है तो महंगाई 25 से 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। अभी महंगाई 2.75 परसेंट है यानी सरकार के पास यहां थोड़ी सहूलियत है। इससे आरबीआई ग्रोथ को मैनेज करने पर फोकस बढ़ा सकता है। आरबीआई के लिए ब्याज दर बढ़ाना शायद जरूरी न हो, लेकिन यदि तेल महंगा होने से महंगाई 5 परसेंट के करीब पहुंच जाती है, तो ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए ब्याज दर घटा पाना भी मु्श्किल हो जाएगा। 


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