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01-04-2026

अमरीका-ईरान युद्ध में छिपे कारोबारी अवसर

  • गत एक माह से अधिक समय से अमरीका+इजरायल का ईरान से जो युद्ध चल रहा है वह चूंकि मानव निर्मित प्रक्रिया का हिस्सा है न कि प्रकृति-निर्मित किसी घटनाक्रम का, अत: उसे प्रथमतया तो हम Creative Destruction की उस प्रक्रिया का हिस्सा मान सकते हैं, जो स्वतंत्र एवं ग्लोबल अर्थव्यवस्था की व्यापकता के साथ बढ़ती चली जाती है। या फिर यह कि हम ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण होते देख रहे हैं जिसमें सर्वोच्च पीढ़ी के लोग भावी पीढ़ी के लोगों को यह शिक्षा देते नजर आते हैं कि बेटा हमने जो बनाया है उसे आप समाप्त करते हुए उसका नव निर्माण करें अथवा यों कहें कि सर्वोच्च पीढ़ी के लोगों द्वारा ऐसा करना उनकी सफलता का मापदंड बनता चला जाता है। उपरोक्त दोनों स्थितियों में से कौनसी बात सही है और कौनसी गलत मुझे नहीं पता, पर अमरीका-ईरान युद्ध का चरम पर पहुंचना यह संकेत देता है कि कुछ ही समय में इसका अंत हो जायेगा। कोई भी जीते या हारे और फिर उसके बाद इजरायल, ईरान सहित खाड़ी के अन्य देशों में जो भारी तबाही एवं विनाश हुआ है उसके पुनर्निमाण एवं नवनिर्माण में वहां की सरकारें एवं सिस्टम जुट जायेगा जो अनेक वर्षों तक ढेरों देशों, जिसमें भारत भी शामिल होगा, में विभिन्न तरह के निर्यात प्रधान कारोबारी अवसरों का सृजन करेगा। जैसा कि हम जानते हैं इस युद्ध में ईरान एवं इजरायल में बड़े पैमाने पर रिफायनरीज, तेल निर्माण से जुड़े क्षेत्र, बंदरगाह, एयरपोर्ट, सरकारी संस्थानों, निजी भवनों एवं सैनिक ठिकानों को या तो भारी नुकसान हुआ है या वे पूर्णत: खत्म हो गये जिसे हम वहां की अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार मानते हैं। युद्ध में तबाह हुए इन संस्थानों के पुनर्निर्माण का काम अब चूंकि नयी तकनीक पर आश्रित होगा, अत: कम्प्यूटर, एआई सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग एवं डिजिटल तकनीक के भारी अवसर पैदा करते हुए कंस्ट्रक्शन मैटेरियल, यथा पत्थर, टाइल्स, सेनेटरी, पाइप लाइन, लेबर, बिजली एवं पानी की सप्लाई से जुड़े ऐसे ढेरों अवसरों का सृजन होगा जो कुछ महीनों तक नहीं वरन वर्षों तक चलेंगे। इस युद्ध में खाड़ी के अन्य देशों जैसे कतर, बहरीन, सउदी अरब एवं यूएई को भी नुकसान हुआ है, अत: वहां की सरकारें भी नष्ट हुए इंफ्रास्ट्रक्चर के पुनर्निर्माण का कार्य पूरे जोर से शुरू करेगी। ऐसा होने का आशय यह भी है कि चाहे तेल महंगा हो या नहीं, पर युद्ध से प्रभावित सरकारों को अपने बजट की भारी-भरकम राशि का निवेश ऐसे कामों में करना होगा और इस प्रक्रिया से जो विकास होगा वह फाइनेंस से लेकर दैनिक उपभोग की चीजों के बाजार को विकसित करेगा या यों कहें कि अगले कुछ वर्ष खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था के विकास के Golden Year बनने की संभावना से भारत समेत अनेक देशों को कारोबारी अवसर उपलब्ध कराने वाले होंगे। इसका सार यह भी कि आगामी दशकों में ऐसा नया ईरान एवं नया इजरायल पैदा होगा जिसकी कल्पना हम आज नहीं कर सकते। युद्ध से पीडि़त सभी देश चूंकि अपनी सामरिक क्षमता यानि युद्ध लडऩे की ताकत को बढ़ाने पर भारी खर्च करेंगे, अत: युद्ध एवं रक्षा से जुड़े उपकरणों की डिमांड भी वहां तेजी से बढ़ेगी। राजस्थान के कारोबारियों के संदर्भ में इस विश्लेषण का आशय यह है कि खाड़ी देशों में भवन निर्माण, लेबर एवं बिजली से जुड़े परम्परागत निर्यात अवसरों के साथ नये अवसरों का भी सृजन होगा जिस पर वे निगाह रह सकते हैं।

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अमरीका-ईरान युद्ध में छिपे कारोबारी अवसर

गत एक माह से अधिक समय से अमरीका+इजरायल का ईरान से जो युद्ध चल रहा है वह चूंकि मानव निर्मित प्रक्रिया का हिस्सा है न कि प्रकृति-निर्मित किसी घटनाक्रम का, अत: उसे प्रथमतया तो हम Creative Destruction की उस प्रक्रिया का हिस्सा मान सकते हैं, जो स्वतंत्र एवं ग्लोबल अर्थव्यवस्था की व्यापकता के साथ बढ़ती चली जाती है। या फिर यह कि हम ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण होते देख रहे हैं जिसमें सर्वोच्च पीढ़ी के लोग भावी पीढ़ी के लोगों को यह शिक्षा देते नजर आते हैं कि बेटा हमने जो बनाया है उसे आप समाप्त करते हुए उसका नव निर्माण करें अथवा यों कहें कि सर्वोच्च पीढ़ी के लोगों द्वारा ऐसा करना उनकी सफलता का मापदंड बनता चला जाता है। उपरोक्त दोनों स्थितियों में से कौनसी बात सही है और कौनसी गलत मुझे नहीं पता, पर अमरीका-ईरान युद्ध का चरम पर पहुंचना यह संकेत देता है कि कुछ ही समय में इसका अंत हो जायेगा। कोई भी जीते या हारे और फिर उसके बाद इजरायल, ईरान सहित खाड़ी के अन्य देशों में जो भारी तबाही एवं विनाश हुआ है उसके पुनर्निमाण एवं नवनिर्माण में वहां की सरकारें एवं सिस्टम जुट जायेगा जो अनेक वर्षों तक ढेरों देशों, जिसमें भारत भी शामिल होगा, में विभिन्न तरह के निर्यात प्रधान कारोबारी अवसरों का सृजन करेगा। जैसा कि हम जानते हैं इस युद्ध में ईरान एवं इजरायल में बड़े पैमाने पर रिफायनरीज, तेल निर्माण से जुड़े क्षेत्र, बंदरगाह, एयरपोर्ट, सरकारी संस्थानों, निजी भवनों एवं सैनिक ठिकानों को या तो भारी नुकसान हुआ है या वे पूर्णत: खत्म हो गये जिसे हम वहां की अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार मानते हैं। युद्ध में तबाह हुए इन संस्थानों के पुनर्निर्माण का काम अब चूंकि नयी तकनीक पर आश्रित होगा, अत: कम्प्यूटर, एआई सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग एवं डिजिटल तकनीक के भारी अवसर पैदा करते हुए कंस्ट्रक्शन मैटेरियल, यथा पत्थर, टाइल्स, सेनेटरी, पाइप लाइन, लेबर, बिजली एवं पानी की सप्लाई से जुड़े ऐसे ढेरों अवसरों का सृजन होगा जो कुछ महीनों तक नहीं वरन वर्षों तक चलेंगे। इस युद्ध में खाड़ी के अन्य देशों जैसे कतर, बहरीन, सउदी अरब एवं यूएई को भी नुकसान हुआ है, अत: वहां की सरकारें भी नष्ट हुए इंफ्रास्ट्रक्चर के पुनर्निर्माण का कार्य पूरे जोर से शुरू करेगी। ऐसा होने का आशय यह भी है कि चाहे तेल महंगा हो या नहीं, पर युद्ध से प्रभावित सरकारों को अपने बजट की भारी-भरकम राशि का निवेश ऐसे कामों में करना होगा और इस प्रक्रिया से जो विकास होगा वह फाइनेंस से लेकर दैनिक उपभोग की चीजों के बाजार को विकसित करेगा या यों कहें कि अगले कुछ वर्ष खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था के विकास के Golden Year बनने की संभावना से भारत समेत अनेक देशों को कारोबारी अवसर उपलब्ध कराने वाले होंगे। इसका सार यह भी कि आगामी दशकों में ऐसा नया ईरान एवं नया इजरायल पैदा होगा जिसकी कल्पना हम आज नहीं कर सकते। युद्ध से पीडि़त सभी देश चूंकि अपनी सामरिक क्षमता यानि युद्ध लडऩे की ताकत को बढ़ाने पर भारी खर्च करेंगे, अत: युद्ध एवं रक्षा से जुड़े उपकरणों की डिमांड भी वहां तेजी से बढ़ेगी। राजस्थान के कारोबारियों के संदर्भ में इस विश्लेषण का आशय यह है कि खाड़ी देशों में भवन निर्माण, लेबर एवं बिजली से जुड़े परम्परागत निर्यात अवसरों के साथ नये अवसरों का भी सृजन होगा जिस पर वे निगाह रह सकते हैं।


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