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03-04-2026

ईरान वॉर भारत के लिए ला रहा गुड़न्यूज

  •  28 फरवरी से भडक़े ईरान वॉर ने भारत के सामने बड़ा चैलेंज खड़ा कर दिया है। ऑइल और गैस महंगी होने के कारण सरकार का इंपोर्ट बिल बढ़ रहा है वहीं डॉलर के मुकाबले रुपया टूट रहा है। ऑइल एंड गैस और रुपये के दोहरे क्राइसिस के इस दौर में एक खुशखबरी आई है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक महीने में अमेरिका में रह रहे भारतीयों के हाथ खजाना सा लग गया है। क्योंकि डॉलर महंगा हो रहा है और रुपया सस्ता। लेटेस्ट डेटा के अनुसार मंगलवार को सायं 5 बजे एक अमेरिका डॉलर 93.88 भारतीय रुपये के लेवल पर था। 28 फरवरी को जब ईरान वॉर शुरू हुआ था, तब एक डॉलर की कीमत 83-85 रुपये के बराबर थी। जैसे जैसे लड़ाई लंबी खींचती गई रुपया भी  फिसलता गया और 30 मार्च को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 95.22 के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। डॉलर भी सेफ हेवेन या सुरक्षित निवेश की कैटेगरी में आता है इसलिए वैश्विक अनिश्चितता के इस माहौल में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसे निकालकर अमेरिकी डॉलर में लगा रहे हैं। जंग शुरू होने के बाद से अब तक भारतीय शेयर बाजार से 3 बिलियन डॉलर की निकासी हो चुकी है। एक तरफ डॉलर की मांग बढ़ रही और वह मजबूत होता जा रहा है दूसरी तरफ रुपया गिरता जा रहा है। अब जब डॉलर मजबूत होगा, तो इसमें मिलने वाली सैलरी की वैल्यू भी भारतीय करेंसी में बढ़ेगी। नतीजा डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट के चलते भारतीय करेंसी में सैलरी की बढ़ी हुई वैल्यू का फायदा उठाने के लिए अमेरिका में रह रहे भारतीय प्रवासी ज्यादा से ज्यादा भारत में पैसा भेज रहे हैं। लोग या तो अपना कोई बकाया लोन चुका रहे हैं या रियल एस्टेट में निवेश बढ़ा रहे हैं। मार्च 2026 के डेटा के मुताबिक, भारत आने वाले रेमिटेंस में 12 परसेंट का उछाल आया है। इसी साल की शुरुआत में अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने रेमिटेंस पर 1 परसेंट का टैक्स लगाया था, लेकिन अब डॉलर के रुपये के मुकाबले 95 के लेवल पर पहुंचने का फायदा उठाने के लिए लोग इस टैक्स को चुकाते हुए पैसा भारत भेज रहे हैं। मान लीजिए कि अमेरिका में रह रहा कोई भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर महीने के 8000 डॉलर कमाता है। युद्ध शुरू होने पर जब डॉलर की कीमत 84 रुपये के बराबर थी, तब उसकी सैलरी भारतीय करेंसी में 672,000 रुपये रही होगी। अब जब डॉलर 93 के स्तर पर कारोबार कर रहा हे, तो उसकी वही सैलरी भारतीय करेंसी में 755,000 रुपये होगी। यानी एक महीने में सीधा-सीधा 88000 रुपये का फायदा हुआ। हालांकि गल्फ के देशों में 90 लाख से ज्यादा भारतीय रहते-कमाते हैं और भारत की कुल रेमिटेंस इनकम में गल्फ का शेयर 38 परसेंट के करीब है। ईरान वॉर के कारण गल्फ में बिजनस सुस्त पड़ जाने के कारण सैलरी में कमी आने की आशंका है जिसका असर भारत की रेमिटेंस इनकम पर भी दिखाई दे सकता है। वित्त वर्ष 2025 में 135.4 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस इनकम के साथ भारत दुनिया में अव्वल था।

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ईरान वॉर भारत के लिए ला रहा गुड़न्यूज

 28 फरवरी से भडक़े ईरान वॉर ने भारत के सामने बड़ा चैलेंज खड़ा कर दिया है। ऑइल और गैस महंगी होने के कारण सरकार का इंपोर्ट बिल बढ़ रहा है वहीं डॉलर के मुकाबले रुपया टूट रहा है। ऑइल एंड गैस और रुपये के दोहरे क्राइसिस के इस दौर में एक खुशखबरी आई है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक महीने में अमेरिका में रह रहे भारतीयों के हाथ खजाना सा लग गया है। क्योंकि डॉलर महंगा हो रहा है और रुपया सस्ता। लेटेस्ट डेटा के अनुसार मंगलवार को सायं 5 बजे एक अमेरिका डॉलर 93.88 भारतीय रुपये के लेवल पर था। 28 फरवरी को जब ईरान वॉर शुरू हुआ था, तब एक डॉलर की कीमत 83-85 रुपये के बराबर थी। जैसे जैसे लड़ाई लंबी खींचती गई रुपया भी  फिसलता गया और 30 मार्च को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 95.22 के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। डॉलर भी सेफ हेवेन या सुरक्षित निवेश की कैटेगरी में आता है इसलिए वैश्विक अनिश्चितता के इस माहौल में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसे निकालकर अमेरिकी डॉलर में लगा रहे हैं। जंग शुरू होने के बाद से अब तक भारतीय शेयर बाजार से 3 बिलियन डॉलर की निकासी हो चुकी है। एक तरफ डॉलर की मांग बढ़ रही और वह मजबूत होता जा रहा है दूसरी तरफ रुपया गिरता जा रहा है। अब जब डॉलर मजबूत होगा, तो इसमें मिलने वाली सैलरी की वैल्यू भी भारतीय करेंसी में बढ़ेगी। नतीजा डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट के चलते भारतीय करेंसी में सैलरी की बढ़ी हुई वैल्यू का फायदा उठाने के लिए अमेरिका में रह रहे भारतीय प्रवासी ज्यादा से ज्यादा भारत में पैसा भेज रहे हैं। लोग या तो अपना कोई बकाया लोन चुका रहे हैं या रियल एस्टेट में निवेश बढ़ा रहे हैं। मार्च 2026 के डेटा के मुताबिक, भारत आने वाले रेमिटेंस में 12 परसेंट का उछाल आया है। इसी साल की शुरुआत में अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने रेमिटेंस पर 1 परसेंट का टैक्स लगाया था, लेकिन अब डॉलर के रुपये के मुकाबले 95 के लेवल पर पहुंचने का फायदा उठाने के लिए लोग इस टैक्स को चुकाते हुए पैसा भारत भेज रहे हैं। मान लीजिए कि अमेरिका में रह रहा कोई भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर महीने के 8000 डॉलर कमाता है। युद्ध शुरू होने पर जब डॉलर की कीमत 84 रुपये के बराबर थी, तब उसकी सैलरी भारतीय करेंसी में 672,000 रुपये रही होगी। अब जब डॉलर 93 के स्तर पर कारोबार कर रहा हे, तो उसकी वही सैलरी भारतीय करेंसी में 755,000 रुपये होगी। यानी एक महीने में सीधा-सीधा 88000 रुपये का फायदा हुआ। हालांकि गल्फ के देशों में 90 लाख से ज्यादा भारतीय रहते-कमाते हैं और भारत की कुल रेमिटेंस इनकम में गल्फ का शेयर 38 परसेंट के करीब है। ईरान वॉर के कारण गल्फ में बिजनस सुस्त पड़ जाने के कारण सैलरी में कमी आने की आशंका है जिसका असर भारत की रेमिटेंस इनकम पर भी दिखाई दे सकता है। वित्त वर्ष 2025 में 135.4 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस इनकम के साथ भारत दुनिया में अव्वल था।


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