यूरोपीय संघ (ईयू) ने कहा है कि ऑटोमोबाइल, मैन्युफैक्चरिंग, मेटल, केमिकल और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में इस वर्ष लगभग 13 लाख नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। यूरोपियन कमिशन के अनुसार अमेरिका-ईरान वॉर के कारण फ्यूल प्राइस में आई तेजी इसका प्रमुख कारण है। ईयू की लेबर कमिश्नर रोक्साना मिन्जातु ने कहा, मध्य पूर्व (वेस्ट एशिया) में जारी वॉर के कारण लगभग 13 लाख नौकरियां जोखिम में हैं और खास तौर पर एनर्जी की ज्यादा जरूरत वाली इंडस्ट्री सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यूरोपीय आयोग के अनुमान के अनुसार सबसे बड़ी मार ऑटोमोबाइल क्षेत्र पर पड़ सकती है, जहां करीब 6 लाख नौकरियां खत्म होने का खतरा है। इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग, मेटल, केमिकल और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में कुल मिलाकर लगभग 56 हजार नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। आयोग ने यह भी कहा कि बैटरी परियोजनाओं से जुड़ी लगभग 85 हजार नौकरियां जोखिम में पड़ सकती हैं, जबकि सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में करीब 58,852 नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है। लो-कार्बन उपायों और ग्रीन शिफ्ट से जुड़े दबावों के कारण स्टील सेक्टर में 4,500 नौकरियां भी समाप्त हो सकती हैं। फ्यूल प्राइस में तेजी का असर आम लोगों पर भी पडऩे की आशंका है। आयोग के अनुसार कम आय वाले परिवारों का ट्रांसपोर्ट फ्यूल पर खर्च 1.4 परसेंट बढ़ गया है। यूरोपीय संघ का मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर लगभग 3 करोड़ लोगों को रोजगार देता है, जबकि सर्विस सैक्टर में करीब 8.7 करोड़ लोग काम करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वेस्ट एशिया वॉर लंबे समय तक जारी रहता है और तेल-गैस कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो यूरोप की इंडस्ट्रीयल कंपीटिटिवनैस पर गंभीर दबाव आ सकता है। इससे कंपनियों की प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ेगी, इंवेस्टमेंट घटेगा और जॉब क्राइसिस और गहरा सकता है।